छटा सी फैल रही है। 
नभ अम्बर के तारो मे। ।

बेशक चाँद चमकता है। 
अब मेरे अरमानो मे।। 

मै कुछ पल जी लेती हूँ। 
अपलक नयन भिरामो मे।। 

चाँद फलक से मुझे निहारे। 
भरकर मुझे आलिंगन मे।। 

मै शरमा कर चाँद निहारू। 
रौशन भूल भुलैया में।। 

शापित उसे मान लू कैसे। 
जो बसता मेरे मन में।। 

उसकी रश्मिया जब फैले। 
हो पवित्रता जीवन में।। 



           "रीमा महेन्द्र ठाकुर