🌹जिंदगी चलती रही 
कदम मैं भी बढ़ाती रही
जीत कदमों में रही, 
हार को भी गले लगाती रही
हर फिक्र को धुएं में उड़ाती रही....

ग़म भुला के अपने, मुस्कुराती रही..
बिखेर कर फूल,
खुद को काटे चुभाती रही,
शिकवा क्या करना किसी से 
हर फिक्र को धुएं में उड़ाती रही... 

जान कर भी अंजान बनी,
गैरों को अपना बनाती रही..
हो गई फना उनके लिए,
अपना वजूद मिटाती रही... 

भीगी आंखें सुखाती रही,
करवटें बदल छुपाती रही..
जिंदा रखना है खुद को, 
टूट कर भी खुद को उठाती रही..

कहीं फिक्र में धुआं- धुआं ना हो जाऊं 
यह सोचकर घबराती रही,
किसी और से ना सही 
एक उम्मीद तुझसे लगाती हूं 
ऐ जिंदगी !
यही सोच कर हर फिक्र को धुएं में उड़ाती रही...

🌹जिंदगी चलती रही 
कदम मैं भी बढ़ाती रही
जीत कदमों में रही, 
हार को भी गले लगाती रही
हर फिक्र को धुएं में उड़ाती रही....

ग़म भुला के अपने, मुस्कुराती रही..
बिखेर कर फूल,
खुद को काटे चुभाती रही,
शिकवा क्या करना किसी से 
हर फिक्र को धुएं में उड़ाती रही... 

जान कर भी अंजान बनी,
गैरों को अपना बनाती रही..
हो गई फना उनके लिए,
अपना वजूद मिटाती रही... 

भीगी आंखें सुखाती रही,
करवटें बदल छुपाती रही..
जिंदा रखना है खुद को, 
टूट कर भी खुद को उठाती रही..

कहीं फिक्र में धुआं- धुआं ना हो जाऊं 
यह सोचकर घबराती रही,
किसी और से ना सही 
एक उम्मीद तुझसे लगाती हूं 
ऐ जिंदगी !
यही सोच कर हर फिक्र को धुएं में उड़ाती रही...



                इंदु भौरिया