वक्त का ये कैसा अजीब सा करिश्मा है।
जीने के लिए दो पल की सांसे मागी थी।।
इस कदर नाराज हुए की सांस ही छीन ली।
तेरी छीन लेते तो कोई गम न होता।।
हर कदम पर साथ निभाना चाहता था।
साथ निभाने वाली साथी ही छीन ली।।
तम्मन्ना था पूरी जिंदगी तेरी जुल्फो के साए में बिताऊ।
लेकिन कुदरत ने वो लम्हा ही छीन लिया।।
ख्वाब में तुम्हारे साथ जीने का देखा था।
न कोई ख्वाब रहा, न ही तुम रही।।
हैरान हूं, मै इस दुनिया के इस
अजीब से अंदाज से।
परेशान हू?दिल में बढ़ते इस मायाजाल से। हैरान हूं, हैरान हू?
लक्ष्मणी खरे🖌️
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