ये शहर अब अजनबी सा हो गया है
जब से वो रूठे है दिल उस जालिम
के प्यार में इस कदर खो गया है
पर वो शक्स किस मिट्टी को बना है
उसके नखरे ही अनूठे हैं मुझे भी
उड़ने की बहुत इच्छा थी उनके
मिलने से पहले हजारों तमन्नाएं
थी दिल में, अब उनके दिल के
पिंजरे में कैद होने का मन करता
है ,अब लगता है उड़ने के सारे
ख्वाब झूठे है , वो पागल मिला
ही इस तरह से था, दिल फिदा
हो गया रिश्ता कोई नहीं था
उस फरेबी से पर अनजाने में
रिश्ता खास हो गया दिल भी
अजीब है ना वहीं करता है
जो जमाने को मंजूर नहीं, मै
इतनी पागल हो गई हूं मेरा
महबूब ही मेरा खुदा हो गया।।
तृषा वर्मा

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