मैं खुद की तलाश में हूँ
ज़िंदगी की रफ़्तार में
मैं अपनी ही हमसफ़र हूँ
मैं अपनी ही हमसफ़र हूँ
मैं ज़िंदगी से बहुत दूर आ गई हूँ
और मैं वहाँ लहरा नहीं
बल्कि कभी डूब रही हूँ
तो कभी तैर
मैं अकेली हूँ
लेकिन कमजोर नहीं
अकेले होते हुए भी
मेरे साथ एक क़ाफ़िला है
जो कि आत्मविश्वास,आत्मसम्मान और
मज़बूत इरादों से भरपूर हैं
मुझे नहीं लगता
कि मुझे एक भीड़ की ज़रूरत है
मैं अपनी मंज़िल के लिये
अकेली ही काफ़ी हूँ
मुझे खुद को ढूँढना है
ज़िंदगी की दौङ में क्यूँ
इतना भाग रही हूँ
ये खोजना है
लेकिन मेरी तलाश अभी भी ज़ारी है
खुद को सँवार रही हूँ
अपनी उड़ान को पंख
आँख़ों को स्वप्न
और खुद को आत्मनिर्भर बना रही हूँ
मैं अपनी ज़िंदगी की कहानी का
एक-एक पन्ना
खुद ही लिखती चली जा रही हूँ
मैं ज़िंदगी से बहुत दूर आ गई हूँ
मैं ज़िंदगी से बहुत दूर आ गई हूँ।।
आरती वत्स

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