कभी समय की कद्र ना की,
लगता था अभी तो वर्षों हैं ।
अपनी मंजिल को पाने के ,
अभी बहुत से रास्ते हैं।।
तब महफिल थी अब तन्हाई है,
प्यार की जगह रुसवाई है।
ख्वाबों का सूना मंजर है,
खुशियों की न अंगड़ाई है।।
जीवन यूं ही गुजर गया,
कुछ कड़वी मीठी यादें देकर।
जीवन संध्या में बैठे सोचें,
क्या पाया मैंने क्या खो कर।।
मिली किसी की हमदर्दी,
तो मिला किसी का प्यार अपार।
किसी ने दिए ताने जी भर के,
तो किसी ने किया जीना दुश्वार। ।
वह समय कहां अब आएगा,
जो पलक झपकते गुजर गया।
कुछ राह दिखा कर निकल गया,
कुछ पाठ पढ़ा कर गुजर गया।।
स्नेह लता पांडेय
नई दिल्ली

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