हे रघुवर! कुछ करो उपाय , 
आस का दीपक न बुझ जाए ,

संकट में तुम्हारी जानकी ,
रक्षा करना मेरे मान की ,

हृदय में स्वामी तुम ही रहते ,
नयन से प्रतिक्षण अश्रु हैं बहते ,

मैं तो ठहरी अबला नारी ,
पर तुम जग के पालनहारी ,

लंकापति बड़ा अभिमानी ,
तुमसे युद्ध की उसने ठानी ,

प्रतिदिन वह आकर धमकाता ,
भांति भांति के स्वांग रचाता ,

त्रिजटा माता बहुत समझाती ,
पर मन ही मन मैं घबराती ,

अब न देर करो , हे नाथ!
कही प्राण न छोड़ दें साथ ,

सिया का अनुनय भूल न जाना ,
कर लंका विजय ,मुझे ले जाना ।



                     प्रीति ताम्रकार