"दिखने में तो आज इक सूखे हुए गुलाब हो तुम।
पर अपनी खुश़बू में आज भी लाज़वाब हो तुम।"
निशि अपने कमरे में बैठेकर सोच रही थी कि अमर आज भी उससे बात करेगा या नहीं ।ये निशि के लिए कोई नई बात नहीं थी उसकी और उसके पति अमर के बीच अक्सर यह स्थिति पैदा हो जाती थी । छोटी से छोटी बात पर वे दोनों उलझ पड़ते थे और उन दोनों का ईगो आड़े आ जाता था कि पहले कौन बातचीत शुरू करेगा। लेकिन झुकना हमेशा निशि को ही पड़ता था जबकि कई बार उसकी कोई गलती नहीं होती थी तब भी । आज भी उसे ऐसा ही कुछ करना पड़ेगा यह सोचते हुए उसने बुक्शेल्फ में से पढ़ने के लिए एक किताब निकाला । किताब खोलते ही उसे किताब के बीच के पन्नों से एक गुलाब का सूखा सा फूल मिला सूखे फूल को देखकर वह अपने अतीत की स्मृतियों में खो गई।
क्या समय था वो........
निशि की अरेंज मैरिज हुई थी। उसके पापा ने उसके लिए एक बहुत ही आकर्षक और सुयोग्य वर ढूंढा था ।
अमर अपने घर वालों के साथ उसे देखने आया था और एक ही नजर में निशि उन्हें पसंद आ गई थी। इन दोनों ने आपस में बातचीत करके एक दूसरे के बारे में भी थोड़ा बहुत जाना और एक दूसरे को अपना फोन नंबर भी दिया। विवाह की तारीख भी पक्की कर दी गई।
अमर और निशि की आपस में फोन पर बातें होती थी। प्यार की बातें करते करते हुए बस में किसी बात पर उलझ पड़ते थे लेकिन निशि बात को संभाल लेती थी और सोचती थी कि विवाह के बाद वह सब मैनेज कर लेगी ।
अमर उसके शहर में ही रहता था। वह उसे अपने छोटे भाई से रोज एक गुलाब का फूल भेजता था जिसे वह बड़े प्यार से अपने कमरे में सजा कर रखती थी । अमर के दिए हुए एक गुलाब को उसने अपने किताबों के बीच में रख दिया था।
आज गुलाब के फूलों को देख कर निशि को पुराने "अमर" की याद आ गई। कितना अच्छा था वो अमर ......जो उसे विवाह के पहले रोज गुलाब भेजता था । विवाह के बाद भी शुरू कुछ समय तक वे दोनों एक दूसरे के प्यार में खोए से रहते थे। लेकिन धीरे धीरे इन दोनों का अहम् आपस में टकराने लगा। निशि तो कुछ समझौता करना सीख गई थी लेकिन अमर अपनी पुरानी आदतों को नहीं बदलना चाहता था । वह हर मामले में अपनी पत्नी से श्रेष्ठ दिखना चाहता था । इन्हीं छोटी-छोटी बातों को लेकर दोनों में टकराव होता और आपस में कई कई दिनों तक उनकी बातचीत बंद रहती घर में कोई रिश्तेदार आ जाता या कुछ बहुत जरूरी काम होता तो निशि ही अमर से बात करती । इस तरह इनकी बातचीत धीरे-धीरे शुरू हो जाती थी और फिर सब कुछ सामान्य हो जाता था। लेकिन एक बात थी कि अमर अब पहले की तरह अपने प्यार को उसके सामने प्रकट नहीं करता था जिससे निशि को लगता था कि उसका प्यार अब कम होने लगा है उसे पुराने अमर के प्यार की अपेक्षा रहती थीे।
इस बार इनका बहुत जोरदार झगड़ा हुआ था । निशि सोच रही थी कि इस बार तो बोलचाल काफी दिन तक बंद रहने वाली है । उसे समझौते की कोई उम्मीद नहीं नजर आ रही थी ।
वह सोचने लगी कि आज अमर आएगा तो मैं उसे इस गुलाब के फूल को दिखाऊंगी तो उसे पुरानी बातें याद आ जाएंगी।
शाम को अमर घर आया निशि सूखा हुआ गुलाब हाथ में लेकर बैठी थी।
उसने देखा कि अमर के हाथ में भी ताजे गुलाब का गुलदस्ता था ।
अमर ने बहुत प्यार से मुस्कुरा कर उसकी तरफ देखते हुए गुलदस्ते को उसके हाथों मे दिया। निशि के हाथों में सूखे गुलाब को देखकर उसकी मुस्कुराहट और बढ़ गई । उसने अपनी पत्नी को गले लगा लिया । अपने पति के इस अप्रत्याशित व्यवहार से वह बहुत भावुक हो गई और उसकी आंखों से खुशी के दो बूंद टपक पड़े ।
थोड़ी देर बाद दोनो कैंडल लाइट डिनर कर रहे थे।
स्नेह लता पाण्डेय
नई दिल्ली

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