जब - जब मैं गिरी ,तुमने गिरने न दिया।
गिरने से पहले ही,मेरा हाथ थाम लिया।
कभी जो गुम हुई,मन के अंधेरों में ।
आगे आकर मुझे ,बाहर निकाल लिया।
देकर एक आशा की किरण
मेरे जीवन को तूने रौशन किया ।
टूटा जो विश्वास मेरा,कभी दुनिया की आँधी में ।
थाम कर हाथ मेरा,तूने विश्वास जगा दिया ।
जीवन की ऊबड़खाबड़ ,उलझी सी पगडंडी
थामकर हाथों को मेरे,गिरने से बचा लिया ।
आज फिर घिर रही हूँ,घनघोर अंधेरों में
उदासियाँ है हर तरफ,मायूसी का है शोर
नही पता मुझे,जाऊँ किस ओर
एक बार फिर से,तेरी दरकरार है
बैचेन है दिल ,तेरी ही प्यास है
ले चलो मुझे ,क्षितिज के उस पार
मिलते हैं जहाँ ,धरती और आकाश
गिर न जाऊँ कहीं,कामना-स्वार्थ के अंधेरों में
थाम लो हाथ एक बार फिर
ले चलो साथ मुझे,उजाले के घेरों में ।।
आशा झा" सखी

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