बाबुल की बाहों में में झूला मैं झूली,
वो प्यार मैं आज भी न भूली।
सारे लाड़ मेरे छूटे मइया के आँचल में,
जब चढ़के आयी सजन घर डोली।
दुनिया की बातें समझने लगी,
माँ की गुड़िया हर साँचे में ढलने लगी।
न जाने कब कहाँ खो गयी ,
जो ढूढने से न मिली सूरत वो भोली।
मन को फिर वो अहसास न मिला,
जो खो गया वो जीवन बिंदास न मिला।
पाने को उसे मै कितना तरसी,
पर न कहीं न मिला कहाँ कहाँ मैं डोली।
आज जब भी पापा कहके गुड़िया बुलाते,
ह्रदय में कितने भाव जग जाते,
हुमक जाती है मन में वो ही गुड़िया,
कहती है तू तो बस अब बड़ी हो ली
अंजू दीक्षित
बदायूँ उत्तर प्रदेश

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