अनुभूतियों के पल जब तुम उकेरती हो कागज पर, 
छू कर उसे साथ हो लेती हूं तुम्हारे, 

जब शब्दों में पिरो तुम गाती हो गीत अनुभति के, 
मै भी संग गुनगुना लेती हूं

जब बनाती हो तुम चित्र कोई, 
अनुभूति के रंग में भिगोकर तूलिका, 
तुम होती हो इंद्रधनुष सी, 
और मै धवल रंग सी एकाकार तुममें... 

जब एकांत में बैठ करती हो तुम 
मनन, चिंतन 
तुम्हारी अनुभूति की तरंगे 
पहुँचती है मुझ तक 
तरंगित होता है तब मेरा चेतन मन... 

तुम और मै 
यक़ीनन दिखते जुदा से है... 
पर अनुभूति के धरातल पर.. 
एक ही है हमारे मन... 







                        कृष्णा सिंहा " इतु 
                      चित्तौडग़ढ़, राजस्थान