थामकर मेरा हाथ ले चलो,
मुझे क्षितिज के उस पार
तोड़कर जहाँ सारे बन्धन
हो जाये बस हमारा मिलन
न हो कोई लोक- लाज
न जमाने का कोई नियम
बस एक डोर प्रीत की
एक साथ प्रेम का
जी लूँ जरा उस पार
एक नई बरखा बहार
कुछ फुहार प्रीत की,
गुनगुनी धूप स्नेह की
प्रेम की एक बरसात में
तेरे साथ भीग लूँ ।
देख लूँ एक मौसम नया
एक वसंत अल्हड़ता का
एक पतझड़ नादानी का
भूल कर दास्ताँ सारी
कर बैठु सारी नादानी
जहाँ मैं रूठ जाऊँ
किसी झुरमुट के तले छिप जाऊँ
तुम ढूढो मुझे हर एक तरुवर के तले
तुम दुलारो मुझे एक कली की तरह
मैं बनूँ फूल तुम भृमर बन जाओ
हर पल मेरे ऊपर मडराओ
तोड़ कर वर्जनाओं को सारी
अपना बेशुमार प्यार बरसाओ।।
आशा झा

1 टिप्पणियाँ