इस कविता की रचना कवर फोटो को देखकर अनायास ही हुई है, आँखों का ये चित्र मेरे 12 वर्षीय बेटे मृण्मय की परिकल्पना है, जिसने ये पंक्तिया मेरे जेहन में उभरा सी दी.. आशा है आप लोगो को चित्र और कविता दोनों पसंद आएंगे...
इंतज़ार में डूबी निगाहेँ,
बीच में पसरा अथाह सागर,
जिसका कोई ओर ना छोर,
दूर तलक बस खारा पानी..
आँखो से बहता,
क्यों सूखता नहीं आँखों का पानी...
यादो का जंगल भी कहाँ सूखता
है निगाहो से...
भुलाने की हर कोशिश पर
हो जाता है और घना....
फिर भी विश्वास है
नैनो में बसें ख़्वाबों को,
दूर दिखेगी एक नौका एक दिन,
जो पा लेगी पार इस सागर पर,
क्युकी तुम होंगे उस पर..
मेरे सपनो की पतवार लिए.....
हाँ उसी दिन खिलखिलाएगी ये ख़ामोशी
फिर से होगी मुस्कान मेरे अधरों पर
कृष्णा सिंहा
चित्तौडग़ढ़

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