कौन जाने मुस्कुराते चेहरों के पीछे
छुपा छुपा सा कोई दर्द भी है

सबको लगती है शख्सियत
साफ शीशे सी
गौर से देखे तो कोई
उस पर गम की गर्द सी है
कौन जाने ....

आंखें जो भीग जाएं
तो पलकों से थामते हैं नमी
न जाने ये हुनर है
या बेबसी ये फर्ज की है
कौन जाने ....

निकलती है ओढ़ के वो
अपने रुख़ पे हिज़ाब
कि पूछे न कोई रंगत तेरी 
क्यूं ज़र्द सी है
कौन जाने ....

न चुका पाए 
जिसका बोझ उठाते हैं हम
ये ज़िंदगी भी लगती
हमें कर्ज सी है
कौन जाने ....
              
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                        –प्रीति ताम्रकार