वो थी अकेली और डरी भी थी!
उन दानवों में वो घिरी भी थी!
लड़ रही थी हर हालात से!
गुम  थी अँधेरी रात में!
सोचती थी कि मैं महफूज हूँ!
पर दरिंदगी के वो करींब थी!

उन पापियों ने यूँ घेरा उसे!
गंदगी से फिर छेड़ा उसे!
वो थी अकेली ना कर पाई कुछ!
भेड़ियों ने दबोचा उसे!
हुआ तार-तार उसका सम्मान!
सोया था तब सारा जहान!

दर्द था हर चीख में!
जख्म से तब भरी थी वो!
अपना ये देश, अपना शहर!
टूटा था फिर क्यों उसपे कहर!
माँबाप की जो एक आस थी!
बन गई वो अब एक लाश थी!

आओ चलो करे एक प्रण!
लड़की को घर मे ना करेंगे बन्द!
उसको बनाए एक शेरनी!
माँ काली की वो परछाईं बने!
डाले कोई जो बुरी नजर!
उसका वहीं करदे वो  वध!

कोमल भलेश्वर
यमुनानगर(हरियाणा)