हरदम चुप ही क्यूँ रहती हूँ ......
ये मैं नहीं कह रही .............
मेरी वो दोस्त कहती है मुझसे!!
जो एक नौकरीपेशा महिला है।
इनकी भी सहती, उनकी भी सहती,
हूँ मैं जिनसे श्रेष्ठ उनकी भी सुनती।
इनकी भी सुनती, उनकी भी सुनती,
गलतियां देख उन्हें अनदेखा करती।
आखिर मैं इतना कैसे सुन लेती हूँ ।
आंखे अपनी बन्द क्यूँ रखती हूँ मैं।
ये मैं नहीं कहती..........
शब्दों की कमी मेरे पास भी नहीं,
मुझमें हैं कमियाँ तो लोगो मेंं
मुझसे कम भी नहीं........
तो मैं उन्हें अपने पर
शासन क्यों करने देती हूँ मैं।
ये मैं नहीं कहती.............
मैने मान लिया है,इसे जीवन का हिस्सा।
मेरी इसमें क्या इच्छा अनिच्छा,
ये सब यूं ही चलता रहेगा।
कल भी सूरज पूरब मेंं ही निकलेगा।
चांद अपने नियत समय पर हीआएगा।
मेरा नसीब भी थोड़े ही बदल जाएगा।
मेरी सहेली ने जब......
मुझसे पूछ लिया यूं ही,
आखिर इतना तू सहती क्यूं है.....?
आखिर इतना तू चुप रहती क्यूँ है....?
किसी को जवाब क्यों नहीं देती है ?
किसी को सलाह क्यों नहीं देती है?
हां एक माध्यम अवश्य मिला है...
अपने उद्गारों को व्यक्त करने का।
शब्दों की माला मेंं........
अहसासों को पिरोने का।
कौन गलत ,कौन नहीं,
पाठकगण निर्णय लेंगे सही.....
ये लिखती अपने दिल के जज़्बातों
टूटे फूटे शब्दों मेंं मैं स्नेह लता!!!!!
स्नेह लता पाण्डेय
नई दिल्ली

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