वसुन्धरा ,अब तृप्त कहा है ,प्यास अभी तक बुझी कहा।
इस जननी की प्यास बुझाने,प्रकृति गोदी भरी कहा।।

मानवता अब कहा बची है,सब बाते बुनियादी है।
परकाष्टा का अँत नही है" सब बाते बेमानी है।।

त्रहि त्रहि कर रहा विश्व है,फैली ये महामारी है।
अब तो सावधान हो जाओ,अब तो सबकी बारी है।।

सोच समझ कर अब पग रखना,काल ने जो मुहँ खोला है।
खुद को खुद जोडे रखना "अमुक नाम वो बोला है।।

सूख गये आँसू आँखो से,कैसा पल छिन आया है।
अब स्वत्रन्त जीवन पर ,कैसा पहेरा आया है।।

सोचो समझो और फिर बोलो"जीवन कितना विषमय है।
जीवन अपना हरपल जी लो,अब सबकी अभिलाषा है।।




                         रीमा महेन्द्र ठाकुर
                        रानापुर ,झाबुआ ,मथ्यप्रदेश