पतझड़ के मौसम सी जिन्दगी हो गई है, बहुत से सूखे पूराने रिश्ते मेरे जीवन की शाखाओं से झड़ने लगे है, कुछ गिर गए छुटकर हमसे तो, कुछ बूढ़े हो चले है,पता नहीं कब जोर का झोंका इन्हें अपने संग उड़ा ले जाएगा|
     कुछ हरे भरे पत्तों ने बचा रखा है मेरा श्रृंगार, कि इनको भी एक दिन चले जाना है..... बस यही सोचकर साथ निभा रहे है सब कि हरा-भरा सा जीवन क्षण-भँगुर है| 
      एक सीख यह भी मिली है पतझड़ के इन दिनों में, की वक्त सबका एक सा नहीं रहता, जब अपने हाथ में कुछ न हो तो अपने भी साथ छोड़कर चले जाते है, हरे- भरे वृक्ष को भी सब सूना छोड़कर चले जाते है... यही तो नियति है, कुछ वीरान वृक्ष अपनों के चले जाने का कहर सहन नहीं कर पाते, वह टूट जाते है | पर जिनका विश्वास उनकी जड़ों की तरह पक्का है वह फिर से नई शुरुआत करते है.... सब्र करते है,  और प्रकृति उन्हें फिर मौका देती है, बसन्त ए बहार लाती है, और वह वृक्ष दमक उठता है नवीन पल्लवों से.... यही जीवन है, जो हमसे जुड़े है वह हमारी शोभा है, और जो अलग हो चुके है उन्हें हम चाहकर भी नहीं जोड़ सकते, वह हवा के झोंकों से उड़ते चले जाएंगे|



                       
                    रंजना सोनी