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ह्रदय की गहराइयों में एक द्वंद जारी है,
लगता है हृदय के सागर में मंथन की तैयारी है,

मंथन के इस सागर में इच्छाओं की रस्सी है,
इच्छा अपनों से जुड़ी है,यह कैसी  कस्सम कस्सी है,

इच्छा अपेक्षा की भावना का नाग है, 
जल जाएगा इन इच्छा में यह कैसी आग है,

फुंकारता द्वंद के सागर में, समझ बैठा खुदको देवता,
इच्छाओं का नाग ह्रदय को चारों तरफ से घेरता,

जहर पीना ही पड़ेगा बना दिया है नीलकंठ,
इस द्वंद ने ह्रदय को दे दिया है कठोर दंड, 

जानता है ह्रदय सागर प्रेम धन है रत्नसमान,
जितना दोगे मिलेगा उतना जगत में मिलेगा सम्मान,

हृदय की गहराइयों में एक द्वंद जारी है,
लगता है ह्रदय के सागर में मंथन की तैयारी है,




                       संगीता वर्मा✍✍