मुद्दतों बाद ये शाम सुहानी आयी है
कायनात में भीनी भीनी खुशबु छायी है
ए अफताब तूझे गुरूर होगा अपने वज़ूद पर
पर मेरे लिए तो वो पूनम की परछाईं है...
राह तकती निगाहें, उसके आने को
एक धुंधली सी तस्वीर उभर आयी है
जला दिए है अरमानो के सारे दीपक
एक अजीब सी टिश क्यूँ उभर आयी है
वो आएंगे इतना तो यकीन है मुझको
अब तो दीपक के बुझने की बारी आयी है
कुछ देर और ठहर जा जरा सा ए चांद
अभी तो मेरे इबादत की बारी आयी है
संजय निराला

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