ना जाने ये बच्चे कब और क्यूँ इतने बड़े हो जाते हैं,
छोड़ माता पिता का हाथ,खुद में
     ही सिमट जाते हैं
आने की तारीख मालूम होती नही
  पर लौट के जाने की तारीख ये तय 
      कर के आते हैं।
ना जाने कब ये बच्चे इतने बड़े हो जाते हैं।
   बिस्तर पर बैठ कर खाना जो खाते थे,
   आज अपनी चादर वो साथ लाते है,
दिन भर हल्ला और मस्ती करने
वाले बच्चे इतना क्यूँ शांत हो जाते हैं
ना जाने ये बच्चे कब बड़े हो जाते हैं
 अब मेरे आशियाने में भी कोई शोर
    शराबा होता नही,
जो चीज जहाँ रखी ,वहाँ से कोई    लेता नही।
  मम्मी बाहर निकलो नहा कर जल्दी ,मुझको भी जाना है,
जल्दी से ब्रेकफास्ट बना दो  आज क्रिकेट मैच जीत के आना है,
   ये सदाये भी अब नही आती,
रात तो बीत जाती है ,पर नींद नही
      आती।
अब टीवी चैनल भी बदलती नही मैं
और रिमोट भी कोई छूता नही,
   लड्डू बना कर रखती तो आज
         भी हूँ मैं
 पर खुद खाने को जी करता नही।
    आलू पराठे पर मक्खन जब भी
        लगाती हूँ,
   चुपके से एक कॉल बच्चो को भी
     लगाती हूँ।
     बाजार जा कर आज भी ढ़ेरो सामान बच्चों की पसंद का लाती 
         हूँ,
    कभी चॉकलेट और कभी आइसक्रीम से फ्रिज अपना सजाती
     हूँ।
जानती हूँ कि अब वो वक़्त,वेबक्त तो नही आएंगे।
    मम्मी जल्दी खाना दो,ये भी नही
पुकारेंगे।
   क्योंकि परिन्दों को अब पंख नए
     मिल गए।
आसमाँ नया,और परवाज भी
   अब ऊंची हो गयी।
हम खुश है बहुत की अब जिम्मेदारी कुछ तो पूरी हो गयी।
    फिर भी पागल दिल ये कहता है,
की ना जाने ये बच्चे कब और क्यूँ
   इतने बड़े हो जाते है।



                    अर्चना आर्ची
                      लखनऊ