तुम अगर कर लेते इक बार ये कुबूल।
 मैं हूँ तेरा आरज़ू।
और दूजी न कोई तेरी जुस्तजू।

.हुई न होती ग़र कोई मुझसे भूल।
दै देता मैं तुम्हें इक लाल गुलाब का फूल।

भावनाओं की तुम्हारे परवाह जो करता
आज यूं तन्हा न तड़पता।

मानता हूँ कि कुछ गलती
मेरी भी थी।
तेरे प्यार को हासिल करने की ज़िद थी।

भूल गया कि प्रेम को हासिल नहीं करते।
होते हैं कुरबान उसपे।

महबूब की खुशियों पे
जान भी है निछावर।
मैं भी जी लूंगा खुशी से।
ग़र खुश़ है मेरा दिलवर।

         स्नेह लता पाण्डेय
                 नई दिल्ली