वक़्त  का  फलसफा  भी  क्या   कुछ  अज़ीब  था
मैं  चलता  गया उसका  रुक जाना  ही  अज़ीब था

नजर उठाकर   देख  लिया  होता उसको एक बार 
मेरे  आखों में  आसुओं का आना बड़ा अज़ीब था

उम्र भर साथ चलने का वादा किया  था उसने कभी
बीच राह मे अचानक उसका मुकर जाना अज़ीब था

जिन लोगों से कभी हुआ करती थी नागवारी हमारी
उनसे अब उसका हाथ मिलाना भी कुछ अज़ीब था

सिमट कर दर्द कब ईन आखों मे ही उतर आया था
ईन आखों को दिखा जब उसका सेहरा अज़ीब था

जिंदगी भर ही हारता रहा जो शख्स मुझसे निराला
उसे मेरा रकीब बानानेका फ़ैसला कुछ अजीब था






               संजय निराला