एक घर की चारदीवारी में 
न जाने कितनी ख्वाहिशें
 दम तोड़ देती है
आग के चूल्हे में
न जाने कितने ख़्वाब
 रोज ख़ाक होते हैं 

तुच्छ मानसिकता
न जाने कितनी औरतों को
ज़िंदा मुर्दा बना देती है

वो रोज मरती है
वो फिर नए सवेरे 
एक और जन्म लेती है
एक उम्मीद के साथ
शायद आज कुछ ठीक हो जाए
शायद आज उसके सपनों को 
परवाज़ मिले
लेकिन उसकी आस 
फिर से ढह
जाती है

वो फिर से 
खुद को ज़िंदा करती है
रोज़ाना एक नई लड़ाई लड़ती है
कभी अपनों से 
तो कभी बड़बोले समाज़ से

खैर छोड़ो
ये तो सदियों से चली आ रही
एक व्यथा है
आज के समाज का आइना है
एक औरत की ज़िंदगी का
काला सच है
इतिहास का एक दर्द है।।



-आरती वत्स✍🏻✍🏻