परवरिश जो बीजों की 
इस कदर की होती.... 
शाखों को फूलों की 
हिफाज़त सिखाई होती.... 

तो फूलों को यूँ 
काँटों के बीच 
ना रहना होता... 
खूबसूरती को यूँ 
चुभन का दर्द ना सहना होता... 

ना किसी बेटी में 
दहशत होती.. 
तन्हा रातो में राहो में... 
जो बेटों को हर बेटी 
की हिफाज़त सिखाई होती..... 

सिखाया होता बेटियों को, 
चौके चूल्हे संग खुदको बचाना,
संस्कारो का दामन  थाम
सिखाया होता उनको पँख फैलाना, 
तो आज बेटियों में इस कदर 
ना हताशा होती....

परवरिश जो बीजों की 
इस कदर की होती...

अपनी लज्जा भंग पर ना द्रोपदी, 
कृष्ण को पुकारती,
बन कर काली वो खुद दानवो को संहारती.... 
परवरिश जो बेटियों की 
इस कदर की होती...
शास्त्रों संग शस्त्रों की 
पूजा भी सिखाई होती ....

ना गर्भवती सीता को, 
यूँ वन वन भटकना होता, 
जो मर्यादा की लक्षमन रेखा ,
पुरुषो के लिए भी बनायीं होती.... आक्षेप लगाने भर से ही 
ना कोई स्त्री सजा की 
हक़दार होती... 
परवरिश जो बीजो की 
इस कदर की होती...

ना आज तलक यूँ 
जार जार होती, 
इज्जत 
सरे आम, 
सरे राह नारी की, 
जो नारी  देह की इज्जत ,
बचपने में  ही  सिखाई होती...
परवरिश जो बीजो की 
इस कदर की होती...

सुंदरता देह प्रदर्शन की 
मोहताज़ नहीं है, 
नारी प्रदर्शन का 
सामान नहीं है, 
वस्त्रो में शोभा है 
इस मानव देह की,
सर पर पगड़ी हो या हो आँचल, 
सुशोभित है ...
पर मुँह कैद रखने की 
ये परम्परा ना बनायीं होती..... 
परवरिश जो फूलों की 
इस कदर की होती.....
शाखों को फूलों की 
हिफाज़त सिखाई होती.... 



                     कृष्णा सिंहा
                      चितौड़गढ़