अंजुरी भर  सपने
दिन में भी मैं लिए घूमती थी।
कभी कभी इन्हें संजोती  भी थी।

खुली आंखो में ये चलते रहते।
मेरे भोलेपन की कहानी बन के।

इन्हें रूकने न देती मैं।
अपने बाबुल की परी थी मैं।
बहुत नाजों से पली थी मैं।
देख था मैंनें एक दिन इक सपना।

इक राजकुमार आएगा मेरे अंगना।
वह मेरे मन को बहुत भाएगा।
सपनों की नगरी में मुझे ले जाएगा।

सुन्दर सा मेरा एक घर होगा अपना।
जहाँ पूरा करूंगी मैं अपना सुन्दर सपना

बहुत मनमोहक उसे बनाउंगी।
अपने सपने की तरह उसे सजाउंगी।
तितली जैसी इतराऊंगी।

लेकिन वो मेरे सपने थे।
हकीकत मे तो कुछ और मिला।
सफने तो सपने होते हैं 
इनका हकीकतों
से क्या वास्ता! ........ क्या वास्ता!...........
अब काले घेरे है.इन आंखों मेंं।
तनहाई है इन काली रातों मेंं।





                  स्नेह लता पाण्डेय
                     नई दिल्ली