डॉक्टर बनना, इंजीनियर बनना,
अधिकारी बन जाना सबकी इच्छा।
पेट पूर्ण पर ज्ञान शून्य उद्देश्य हीन आज की शिक्षा ।
मानव चंद्र तक पहुंचा पर मानव बनने की है अनिच्छा।
धर्म, जाति, भाषा के झगड़े है नूतन शिक्षा की दीक्षा।
साथ कहे हम करें अहिंसा।
सब में बांटे ज्ञान की शिक्षा।
दया, धर्म ,मानवता से बढ़कर। जग में नहीं दूसरी शिक्षा।
धर्म ,जाति ,संप्रदाय भूलकर मानवता का दें संदेश।
हिंसा घृणा भाषा के झगड़े छोड़े यह आतंकित परिवेश।
शांति,प्रेम ,मैत्री का पथ, अपना पथ हो सबकी इच्छा।
मानव - मानव बन कर जिए।
प्रभु सबको ऐसी दो शिक्षा।
स्वर्गीय प्रेम शंकर पाण्डेय
गोरखपुर

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