गुनगुना दो न.......
सजन प्रेम रस से 
भरा कोई गीत।
सुना दो न सजन............
कोई सुन्दर मधुर संगीत।

झुका लो अपनी तुम.....
घनेरी अलकावली।
सिंचित कर लो........
 मधुर रस से.........
 अपनी अनूठी शब्दावली।
 वातावरण मेंं मधुमास 
 का उत्सव भर दो न।
 गुनगुना दो न सजन........
 
 तुम प्रफुल्लित हो उठो..
 प्रातः उषा के रंग सी।
 अंग अंग सुसज्जित 
 कर लो.............
 नव वधू के सौंदर्य सी...
 तरकश मेंं एक तीर.....
  मदन का...
 अपने पास रख लो न।
 गुनगुना दो न सजन.......

राग ऐसा छेड़ दो..........
झनझना उठे
वीणा के तार, अपने आप।
तुम्हारी स्वर लहरी गूंजे......
अनन्त क्षितिज के पा तक......
श्रृंगार रस से .............
कोई पगी कविता.........
आज सुसज्जित कर दो न।
गुनगुना दो न सजन...........

स्नेह लता पाण्डेय
        नई दिल्ली