नैनों से छलक रहा मकरंद।
गोरी! क्यों मुस्कुराती हो मंद मंद ?
सुर्ख कपोलों पर महक रहे टेसू,
मलय गंध से महक रहे गेसू।
कुंदन मुख तप जाता है, गोरी ! क्यों शर्माती हो मंद मंद ?
हिरनी से भीत भीत नैना, पलकों में तैर रहा सपना। गोरी तुम कविता हो! वीणा हो ! या छंद छंद?
बागों में खिल उठी कली, मेघों मेंं चमक पड़ी बिजली।
छलकी मधुशाला रन्ध्र रन्ध्र।
गोरी क्यों हंसती हो मंद मंद ?
अंकुर पंखुड़ उड़ने लगा पराग ।
महुआ महका लगी कनेर में आग ।
सहज सजीला यौवन गोरी!
महकाती हो मादक गंध गंध ?
कूक दो कोयल जैसी बोल !
कली कचनार होठ दो खोल।
मोहन मंत्र सुना दो आज! गोरी! वीणा है क्यों बंद बंद?
स्वर्गीय प्रेम शंकर पाण्डेय
गोरखपुर

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