टोपी को कभी बोलते न देखा, फिर भी बोलती टोपी।
कोई समझे या ना समझे मिल जाती बोलती टोपी।

देश विदेश कहीं भी जाओ सब लोग जानते टोपी।
हर इंसान को पता की कैसे किसीकी बोलती टोपी।

हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई अपना अपना मज़हब।
कभी तो देखो उसके धर्म कह जाती बोलती टोपी।

भारत के हर प्रान्त की पहचान होती उसकी टोपी।
हर एक इंसान का प्रदेश सूना जाती बोलती टोपी।

कुछ देश ठंडे या कुछ देश गर्मियों में तपते रहते।
अपने अपने देश की पहचान सुनाती बोलती टोपी।

कुछ लोगों की आदत है ईसकी टोपी उसके सर।
गर तुम जान सको तो समझा सकती बोलती टोपी।




      फिरोज दहिवाला