ओ साथी .......
ये तेरे प्यार का बंधन......
जो ना किसी डोर से बंधा
बंधा हैं तो बस
प्यार भरे विश्वास से.......


ओ साथी...
तेरा ये बंधन
रोकता है मुझको
तुझसे दूर जाने के ख्याल से......


ओ साथी.....
तेरा ये बंधन
कभी मन करता है
तुझे बताऊं
कि मैं क्या सोचता हूँ....
क्या चाहता हूँ....

पर
ओ साथी
फिर रोक लेता है
तेरा ये बंधन.....

कहता है
प्यार तो यही है
कि 
मैं कुछ न कहूं
कुछ न चाहूं

तुम हो न......
तुम हो न,,,,
और बस
तुम हो न .....
और
तुम्हारा ये बंधन ।।।।।।।।।।।।।


मुकेश दूहन
सोनीपत, हरियाणा