कठपुतली है सभी यहां पर,
देखो,वो धागा खींच रहा है,
किस मोड़ पर,जाने क्या होगा---
क्या पाया क्या खोना होगा---
इससे हम अनजान हैं,
नाच रहे हैं इधर उधर---
धागा उसके हाथ है,
वह मोड रहा है तोड़ रहा है,
सब को सबक सिखा रहा है,
बड़ा ही पक्का धागा उसका,
पर नजर नहीं वो आ रहा है,
कोई कहता,उसको परमेश्वर,
कोई खुदा बता रहा है,
कोई अल्लाह कोई जीजस,
कोई वाहेगुरु गा रहा है,
यह दुनिया उसकी रखवाली---
सब को कुंदन बना रहा है,
ठोक पीटकर थोड़ा तपा कर---
सबको स्वर्ण बना रहा है,
हम सब उसकी कठपुतली हैं,
फिर भी कुछ अनजान है,
जानते हैं यह सत्य है,
फिर भी कुछ नादान है,
सच्चाई की कठोर डगर है,
बुराई बहुत आसान है,
अंत बुराई का बुरा है,
सच्चाई की शान है,
हम सब उसकी कठपुतली है,
धागा उसके हाथ है,
क्या पाना है क्या खोना है,
इससे हम अनजान है,
हम सब उसकी कठपुतली है,
इतना सब को ज्ञान है,
संगीता वर्मा✍✍

0 टिप्पणियाँ