भानु सब देख रहा है वीरो के रणभूमि को।
प्रखर वार सीने पर खाते देखा वीर शहीदों को।
निशिवासर अटल रहे धैर्य देखा वीर सपूतों का।
उछाह भरा छाती में पलट राह ना देखे पिछे का।

अवनत ना मस्तक करते तान के सीना चलते है।
शववस्त्र मस्तक बाँधे सिंहों का दहाड़ गरजते है।
निर्भीक होकर डटे रहे रक्तो का होली खेल रहे है।
जगमग ज्वाला दीपों की बारूदों को झेल रहे है।

चिंता ना प्राणों का है मृत्यु का स्वागत करते है।
शत्रुजय कर गर्व हृदय में पावन ध्वज फहराते है।
अभिजीत का उद्घोष करे भारत माता के नारे है।
देख प्रताप सुरो का भयभीत प्रभाकर होते है।

लाल धरा के वो बने ध्वज तिरंगा में लिपटे आते।
बलिदान किये प्राणों का न्यौछार तन मन से होते।
अमरता का जयकारों से अंतिम जय यात्रा करते।
अपनी गौरव शौर्य गाथा इतिहास के पन्नो मे रचते।
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सतेश देव पाण्डेय