कहना सुनना सब भुल के तेरी आंखों में खो जाती हूं
तुम जब सामने आते हों
धीरे धीरे फिर जब तुम मेरी ओर कदम बढ़ाते हों
उखड़ने लगती है सांसें मेरी ज़ोर ज़ोर से दिल धड़काते हो
तुम जब सामने आते हों
जब प्यार से मुझे छुते हों मैं मछली सी तड़प जाती हूं
कहना कुछ और ही चाहती कह कुछ और जाती हूं
तुम जब सामने आते हों
जाने क्या हाल कर जाते हो,शर्म से लाल कर जाते हो
झुकाती हूं नज़रों को फिर से शरमा कर तो पलको पे चुम्बन सजाते हो।
तुम जब सामने आते हों
काजल निकाल कर मेरी आंखों से मुझे काला टीका लगाते हों
कितनी फुर्सत से बनाई गई हूं मैं आंखों आंखों में बतलाते हों
तुम जब सामने आते हों
एक मुस्कान से करते हों दवा मेरी, हर मर्ज दूर भगाते हों
कभी हंसते हों मेरी नादानियों पर तों कभी प्यार से चपत लगाते हों
तुम जब सामने आते हों
कितने ही अनकहे वादे तुम बिन कहें पूरे कर जाते हो
उस एक लम्हें मै जैसे पूरी जिंदगी दें जाते हो
तुम जब सामने आते हों
इन हाथों को लेकर हाथ में जब अपने पास बिठाते हों
मेरी उलझी उलझी लटो को भी जब अपनी ऊंगलीयो से सुलझाते हो
सुनते हो मेरी सब बातें कुछ अपनी भी सुनाते हों
मेरा रोना हंसना लड़ना झगड़ना सब सर माथे लगाते हों
फिर कसकर तुम मुझे जब अपने सीने से लगाते हों
सिमटी सहमी शरमाई मैं तुम आलिंगन में छुपाते हों
चूमते हों माथे पर मुझे मेरे गालो को सहलाते हों
तुम जब सामने आते हों
फिर धीरे से होंठों को अपने मेरे कानो के पास लाते हों
कान्हा की मुरली के धुन पर प्रेम का राग सुनाते हों
बिखरने लगती हूं बांहों में तेरी मेरी सुध-बुध हीं ले जाते हो
एक एक पल कैसे संभालू मेरी बैचेनी बढ़ाते हों
धक धक धक धक धक धक मेरी धड़कनें तेज भगाते हों
तुम जब सामने आते हों
फिर लम्बी सी खामोशी टुटती है जब धड़ाम की आवाज गूंजती हैं
और फिर से एक बार मैं पलंग से नीचे गिर जाती हूं
पूनम लोहार
उदयपुर राजस्थान

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