मोहलत दे दो बस
इतनी सी,
जी लू मैं कुछ और जरा सा।
देख लू आँगन को अपने,
खेलूं मैं वहीं खेल जरा सा।
बचपन को दे दू गुडियां अपनी,
कह लू मैं कुछ और जरा सा।
निम्बोलिया चुन लू बिखरी हुई,
चख लू मैं कुछ और जरा सा।
सुन लू कहानियां वो अधूरी सी,
देख लू मैं कुछ और जरा सा।
मोहलत दे दो बस इतनी सी,
ढूंढ लू मैं खुद को जरा सा....।..
मुकेश दूहन
सोनीपत,हरियाणा

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