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दो दो कुल की आन बान शान होती ।बेटियां।
अपने मां पिता का ही अभिमान होती बेटियां।
कोयलिया की गीत होती सृष्टि की ये मीत होती
खुशियों की पैगाम फूल गुलाब होती बेटियां।
तुलसी की बिरवा सी पावन शुचि पावनी
वेदों की ऋचाए गीता पुराण होती बेटियां।
सृजन करती जगत का वंश बढ़ाती दो कुल का
तभी तो इनको कहते हैं अभिमान होती बेटियां।
त्रिवेणी की धार होती सबके मन का प्यार होती।
प्रकृति की अनुपम अद्भुत उपहार होती बेटियां।
दर्द छुपा के हंसती रहती कष्टों को भी हंस के सहती।
अबला मासूम लाचार ना बेजार होती बेटियां
बिन बेटी है सूना आंगन जैसे कोयलिया बिन मधुबन
बेटी से घर आंगन रौनक खुशियों की भंडार होती बेटियां।
हंसते हंसते विष पी लेती सारे दुख हंस कर सह लेती
लेकिन बुरी नजर वालों को लेती हैं ललकार बेटियां।
मत मारो सृजनहारी है नफरत ना अपमान दिखाओ।
बिन बेटी सारा जग सूना इन्हे बढ़ाओ इन्हे पढ़ाओं।
माना लक्ष्मी रूप शारदा दुर्गा काली कहलाती है।
लेकिन चोट लगे इज्जत पर बन चिंगार जाती बेटियां।
कोमलांगी कहलाती बेटी सृष्टि की सृजन हारी है।
वक्त पड़े तो निज हाथ उठा लेती तलवार बेटियां।
** मणि बेन द्विवेदी
वाराणसी उत्तर प्रदेश

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