क्या कभी मेरे पास एक ,
जादू की छड़ी होगी ।
क्या मेरी कभी यह,
इच्छा पूरी होगी।
अगर कभी मैं एक ,
जादू की छड़ी पाऊंगी।

उसके करिश्मे से मैं एक, 
नई दुनिया बनाऊंगी ।
अमीरी ,गरीबी धर्म संप्रदाय,
ऊंच ,नीच का भेदभाव।

यह यह सब वैमनस्यता ,
समाज से मिटाऊंगी।
दहेज प्रथा, बाल विवाह, 
सती प्रथा ,तीन तलाक।

जानवरों पर अत्याचार,उनकी, 
चमड़ी हाथी दांतो का व्यापार।
हरे जंगलों को काटना चंदन, 
की लकड़ी की तस्करी।

उस छड़ी को बोलूंगी कि,
वह कुछ ऐसा करे ,
सामाजिक कुरीतियों को ,
जड़ से दूर करें।
अंधविश्वास,जादू,टोना,
ढोंगी बाबाओं के करतूतों का,
भांडा सबके सामने फोड़े।
ताकि लोगों की आंखें खुलें।

बोलूंगी मैं अपनी,
जादू की छड़ी को।
वह ढूंढ लाए समाज के ,
सभी वहशी दरिंदों को ।
जो अपनी कुत्सित वासनाओं ,
को पूरा करने की खातिर ,
अपने मुंह को काला करते हैं। 
अपने मद में अंधे ,
होकर किसी मासूम,
के द़िल को छलनी करते हैं ।

साइबर क्राइम, पॉलिटिकल क्राइम ,
मेडिकल क्राइम,ये क्राइम,वो क्राइम,
ना जाने कितने क्राइम।
कितने सारे जाने अनजाने घोटाले ।
जादू की छड़ी घुमाउंगी ,
सबको लाइन में खड़े करके ,
उससे ही पिटवाऊंगी

ना कोई बहुत अमीर होगा,
न ही कोई  बहुत गरीब होगा ।
सामंजस्य रहेगा सबके बीच,
हर एक प्राणी खुशनसीब होगा।
अकर्मण्य राजनेताओं को ,
सत्ता के गलियारों से हटाऊंगी।

जादू की छड़ी तुम कुछ ऐसा करो ।
सभी लोगों को एक समान कर दो ।
दीन दुखियों को सुखी कर दो,
और रोगियों को निरोगी।

जादू की छड़ी को बोलूंगी,
वह कुछ ऐसा करतब दिखाए 
पूरी दुनिया में यदि राम राज्य में ,
सब कुछ बहुत अच्छा था तो।
उससे भी बहुत अच्छा,
एक आदर्श वादी राष्ट्र,पुनः आए।

जादू की छड़ी का होगा ,
ऐसा अद्भुत चमत्कार ,
एकदम खुश़नुमा दिखेगा ये संसार।
सभी लोग बनेंगे,
प्रयत्नशील और प्रगतिशील,
रहेंगे सब साथ साथ म़िलजुल।

स्नेहलता पाण्डेय
     नई दिल्ली