राष्ट्रीयता एक ऐसा अखंडदीप है ,
जिसे सुदूर सीमाओं का कटोरा चाहिए।
जिसकी ज्योति प्रज्ज्वलित रखने हेतु ,
नेतृत्व की मोटी अखंड बाती चाहिए।
इस बाती के रंध्र रंध्र में, भरा हुआ राष्ट्रीयता का तेल चाहिए।
राष्ट्रीयता वह तेल है जब तक दीप में रहेगा,
राष्ट्र का आलोक चारों दिशाओं में जगमग जगमग बिखरेगा।
राष्ट्रीयता एक ऐसी भावना है ,
जो धार्मिक, राजनीतिक क्षेत्रीय भावों से ऊपर है।
भाषाई व सांप्रदायिक भावों इतर है।
जैसे स्वस्थ शरीर के लिए प्राण अनिवार्य है।
वैसे ही एक सुदृढ़ राष्ट्र के लिए ,
उसके जन - जन में राष्ट्रीयता का भाव अनिवार्य है।
राष्ट्रीयता एक ऐसी परिकल्पना है ।
जो किसी राष्ट्र के जन-जन में यदि हो जाए ,
तो वह राष्ट्र सुखी ,समृद्ध, व सर्वथा अपराजेय हो जाए।
स्वर्गीय प्रेम शंकर पाण्डेय
गोरखपुर

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