"गृहिणी हूँ मैं, 
आज तुम्हे अपनी बात बताती हूँ।
गांव की सीधी सादी हूँ,
शहर की भाषा समझ नहीं पाती हूँ
सुबह सवेरे पौ फटते ही मॉर्निंग वॉक पर जाती हूँ
फिर स्नान कर प्रभु चरणों में शीश नवाती हूँ।

गृहणी हूं मैं, आज तुम्हे अपनी बात बताती हूँ,
सुबह नाश्ता फिर खाना कपड़े बर्तन में जुट जाती हूँ। 
बजे फोन की घंटी वो अपने पास बुलाती है।
मम्मी पापा को बिटिया की चिंता बहुत सताती है।
फोन स्पिकर पर लगा के फिर काम में जुट जाती हूँ।
घर ही मेरी कर्मभूमि है मन को ये समझाती हूँ।

गृहिणी हूँ में, आज तुम्हे अपनी बात बताती हूँ।
झटपट करके चौका चूल्हा,  
सासु की सेवा में मन लगाती हूँ 
बन के नर्स, कभी सहचरी, 
ससुर जी के काज निपटाती हूँ।

गृहणी हूँ मै, आज तुम्हे अपनी बात बताती हूँ,
बच्चों के साथ में पढ़ना, उनके स्कूल की डांट भी सुनना ये मेरे हैं सब काम,
कभी ड्रेस तो कभी किताबें कभी खिलौने ले कर आना सुबह और शाम,
रिश्तेदारी में मुस्काना रिश्ते निभाना बिना इनाम।

गृहिणी हूँ में, आज तुम्हे अपनी बात बताती हूँ।
सुबह से लेकर देर रात तक बिना रुके करना काम
कुछ खत्म हुए कुछ बाकी इसी चिंता में आती रात
खाना खाते सब के चेहरे देखूं कहीं न हो कोई नाराज़ 
सबके बाद बचे जो खाना उसको ही मानू सौगात
बर्तन मांजती सोचती रहती एक ही बात
फिर कल होगा, पर क्या कल (चैन) होगा या फिर होंगे यूंही जीवन के दिन रात
गृहिणी हूँ मैं, आज तुम्हे अपनी बात बतातीहूँ।।"

               
                  



            अम्बिका झा