तपिश सूरज की
अब सही नहीं जाती
हर बात जुबां से
कही नहीं जाती
दे दो हमें भी
अब पनाह जरा सी
मिल जाएं जहां हमें भी
छांव जरा सी
पीने को कुछ
बूंदे हो
खाने को कुछ
दाने हो
ज्यादा क्या मांगा है तुमसे
हम तो हैं
मासूम परिंदे
तुम्हारे साथ ही हमारी भी
जुड़ी जिदंगानी है
आज यहाँ हैं
कल उड़ जाएंगे
कहानी तुम्हें कोई
नई दे जाएंगे......
मुकेश दूहन
सोनीपत हरियाणा

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