महलों के सपने में देखते कहां
पैरों में चप्पल ये पहनते कहां
दो वक्त की रोटीयां उन्हें मिलती कहां
दौलत के बारे में वे सोचते कहां
उनके भी कुछ सपने अधूरे रह जाते हैं
हर दिन खाने को रोटीयां उनके नसीब कहां हो पाते हैं
दिन गुजर जाते हैं पर जिंदगी कहां
प्यास बुझ जाती है पर भूख कहां
मजबूर हैं अपने हालातो से पर बेईमान कहां
गुब्बारे बैच जाते हैं पर गरीबी कहां
पूनम लोहार
उदयपुर राजस्थान

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