ये मेरा घर है ... 
और तुम सब निकल जाओ इस घर से.. 
यह कहते हुए रमेश बाबू ने बड़ी ही गुस्से में गिलास जमीन पर दे मारा। 
वह गिलास चकनाचूर होकर  जमीन पर बिखर गया |

(आज वह गिलास ही चकनाचूर नहीं हुआ बल्कि शांति निवास में एक बुजुर्ग माता - पिता  के सपने भी चकनाचूर हूए हैं |
वह सपने जो हर माता पिता अपने बच्चों के लिए देखते हैं , उनके बच्चे खुश रहे ओर घर में सुख शांति बनी रहे |
माता - पिता इसके अलावा  क्या चाहेंगे.. ) 

खेर... 

शांति देवी  रमेश  का गुस्सा शांत कराने की कोशिश करती है |
किन्तु रमेश का गुस्सा आज सातवें आसमान पर है। 
लेकिन आज दोनों बेटों ओर बहुओ ने भी कोई कसर नही छोड़ी घर की शांति भंग करने की 
आज अगर गुस्से की बात की जाये तो रमेश डाल - डाल ओर उनकी दोनों बेटा बहुएं पात - पात 
झगड़े का अंत यही हुआ की दोनों बेटा - बहु अपने - अपने कमरे में चले गये और  रमेश गुस्से से आग बबूला होकर घर के आंगन  में बिछी चार पाई पर  जाकर बेठ गए | 

अपने मोहल्ले में सबसे नामचीन घर है रमेश बाबू का ओर उस घर का नाम उनहोंने बडे़ प्रेम से  अपनी पत्नी शांति के नाम पर रखा है |
         
                  शांति विला

घर का नाम शांति विला रख देने से घर में  शांति नहीं आ जाती है |

आज का झगड़ा शांति विला के नाम पर एक  व्यंग हैं|
        
*****
शांति विला के मुखिया है, रमेश बाबू  ओर इस घर की सूत्रधार है शांति देवी.. 
शांति देवी के घर में बडा़ बेटा विनोद ,  बहू सविता, ओर इन दोनों की  नो वर्षीय बेटी शिखा ओर छोटा बेटा चंदर , बहू पिंकी ओर 2 वर्ष  का बेटा कायरव हैं |
*****

विनोद -- नहीं रहना है मुझे इस घर मे जहाँ भाई- भाई में फर्क किया जाता है!! 
और आज तो बहुओ में भी फर्क होने लगा.. 
सविता जल्दी से अपना सामान बांधो हम आज, अभी , इसी वक्त इस घर को छोड़कर जा रहे हैं |
विनोद गुस्से से चिल्लाया  |
तभी सविता विनोद के पास जाकर उसे समझाती हैं|
आप जरा शांत हो जाइये  वो पिताजी हे हमारे
और अगर गुस्से में उन्होंने हमे कुछ कह भी दिया
तो इसका मतलब यह नहीं  हे, कि पिताजी हमें नहीं चाहते उनकी नजर में आप ओर भैया दोनों समान हो!!
तुम जो भी कहो मैं मानने वाला नहीं हूँ
ओर अब मैं इस घर में नहीं रहूँगा।
सविता विनोद को समझाते हुए कहती है
"गलती तो हर इंसान से होती हैं 
ओर झगड़ा किस घर में नहीं होता है?? 
आज इस घर में जो भी झगड़ा हुआ है|
इसकी जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ में हूँ |
कोई ओर नहीं |" 
मैं अपनी करनी पर बहुत दुखी हूँ मुझे भी आज इतना बड़ा कदम नहीं उठाना चाहिए था | सविता रो पडी़.. 
विनोद ने सविता को समझाते हुए कहा तुमने आज जो कुछ भी करा वो सही करा 
अगर मे भी तुम्हारी जगह रहता तो यही करता..
सविता अब हम इस घर में नहीं रहेगें
विनोद अलमारी में बेग निकाल रहा था, किन्तु 
सविता  ने विनोद को अपनी कसम देकर उसे  इस घर से जाने से रोक दिया.. 
विनोद गुस्से में बेग  पलंग पर पटक कर घर के बाहर चला गया तभी विनोद की नजर आंगन में  बेठे पिताजी पर जाती है लेकिन विनोद बिना कुछ बोले मेन गेट से बाहर हो जाता हैं |
खटिया पर बेठे माँ - बाप निरस आंखों से कभी विनोद को तो कभी घर को देखते रह जाते हैं|

****

रात में डिनर का समय हो गया सविता ने सबके लिए डिनर बना दिया  किसी का खाने का मन नहीं था 

पिंकी गुस्से के मारे अपने कमरे से बाहर नहीं आई..
डाइनिंग टेबल पर शांति का माहौल था |
किसी ने किसी से कोई बातचीत नहीं की
सबने अनमने ढंग से  डिनर किया ओर सब अपने कमरे में चले गए रमेश बाबू भी अपने कमरे की ओर जाने लगे तभी सविता ने उन्हें रोक दिया.. पिता जी मुझे आप से कुछ बात करनी है |
हाँ बोलो .... 
रमेश बाबू ने तीव्र स्वर में कहां
पिताजी आज जो कुछ भी हुआ उसके लिए मुझे माफ़ कर दीजिए | 
रमेश बाबू  कुछ न बोले और अपने कमरे में चले गए |
सविता  ने शांति देवी से भी बात करने की कोशिश करी शांति देवी भी कुछ ना बोली..
वो भी अपने कमरे मे चली  गई .. 
सविता पिंकी का डिनर  बिना कुछ बोले पिंकी के कमरे में रख आई  पिंकी भी गुस्से से मुह फुलाये कुछ न बोली  |

सविता को आज अपने घर की दुर्दशा देखकर बहुत दुःख हुआ |
अपने घर में कभी इस तरह का मन मुटाव नहीं हुआ ओर आज बात यहाँ तक पहुँच गई घर के सदस्य ही आपस में बात नहीं कर रहे हैं |
यह सब सोचते - सोचते रात के दस बज गए 
रात 11 बजे सविता के भाई का फोन आया
मम्मी की तबीयत खराब है |
और वह  तुम्हें यहां मायके बुला रही है|
सविता ने कहा ठीक है , भैया आप मुझे कल लेने आ जाओ और उसने फोन कट कर दिया |
सविता ने विनोद से बात की विनोद ने सविता को मायके जाने के लिए हां कह दिया |
सविता ने  रात में ही अपनी  पेकिंग कर ली .. 
सविता के मन में बहुत उथल - पुथल मची हुई थी |

वैसे तो  सविता बहुत समझदार महिला है, किन्तु सविता की  समस्या यह है , कि वह अपनी तकलीफ या दुख किसी के सामने कह नहीं पाती है 
तभी सविता ने एक खत लिखा ..
आज ना चाहते हुए भी मेने  पिताजी का बहुत दिल दुखाया है | शायद इस खत को पढ़कर पिताजी मेरी भावनाओं को समझे 
ओर उस खत को रात के समय चुपके से अपने ससुर रमेश बाबू की डायरी में रख दिया क्योंकि वह जानती थी 
कि पिताजी की डायरी लिखने की आदत  है ओर वह रोज की तरह  जब डायरी लिखेंगे तो वह यह खत देखकर जरूर पढेंगे ओर खत रखकर वह अपने कमरे  में जाकर सो गई.. 
सुबह सविता ने जल्दी उठकर सारा काम निबटा लिया तब तक सविता का भाई भी आ गया 
सविता के भाई को देखकर कर रमेश बाबू  ओर शांति  देवी  चोक गये..
वेभव उनके चरण स्पर्श कर वही सोफे पर बेठ जाता है, तभी वेभव उंहें बताता है, की मम्मी की तबियत खराब है ओर उनकी इच्छा दीदी से मिलने की है इसलिए  दीदी को अपने साथ लै जाने के लिए आया हूँ |
तब तक विनोद ओर सविता भी आ जाते 
सब साथ मिलकर लंच करते हैं , फिर सविता    अपने सास, ससुर और पति से विदा लेकर 
अपने भाई के साथ मायके आ  जाती हैं। 

****

सविता के मायके जाने के बाद सासुमां ने घर की कमान अपने हाथ में  ले ली।
और अपने हाथ से पूरा काम छूट जाने के कारण वह फुरती से काम नहीं कर पा रही थी।
वेसे तो घर मे कामवाली बाई भी लगा रखी है, जो
झाड़ू पोछा कपड़े, बरतन सब करके जाती है, किन्तु घर में ओर भी ऐसे  काम होते जो काम वाली बाई के भरोसे नहीं रख सकते यह काम तो सिर्फ एक कुशल  ग्रहिणी ही कर सकती हैं |
शांति विला की कुशल ग्रहिणी है , सविता ! लेकिन उसके मायके जाने के बाद घर ग्रहस्थी ना चाहते हुए भी शांति देवी को ही चलानी पड़ रही है पिंकी से तो कुछ खास उम्मीद है ही नहीं 
पिंकी आती जो काम बना वो करा..
नहीं बना उसे छोड़ दिया..
ओर कायरव को लेकर चली अपने कमरे में ..
घर में क्या हो रहा है उसे कोई मतलब नहीं 
झगड़े के बाद से किसी से बातचीत  नही  करना 
ना ही कुछ बोलना चुपचाप अपना काम करना और अपने कमरे में चले जाना..
अब पिंकी ने आदत बना ली थी |

रात के समय  सब डिनर कर अपने कमरे में चले गए |
रमेश बाबू  भी रात्रि भोजन कर अपने कमरे में चले गये | 
अपनी  आदत के अनुसार डायरी लिखने
के लिए उन्होंने  जैसे ही डायरी खोली उसमें एक खत था रमेश ने वह खत खोला ओर वह खत की लिखावट देख समझ गये यह खत हो ना हो सविता ने ही यह खत लिखा है |
रमेश बाबू समझ गये की सविता ने माफ़ी मांगने के लिए यह खत लिखा होगा  लेकिन गुस्से में आकर रमेश बाबू ने उस खत को वापस रख डायरी मे रख दिया और बिना डायरी लिखे ही सो गये। 
यही सिलसिला लगातार दो रात तक चलता  रहा तीसरी रात भी रमेश बाबू ने डायरी नहीं लिखी .. 
और अपने बिस्तर पर  लेटे रहे किंतु आँखों से नींद कोसो दूर थी 
रमेश जी  डायरी खोली ओर उनसे अब रहा नहीं गया उनहोंने उस खत  को खोला
  खत खोलते से ही पहले पेज पर लिखा था
पूज्य पिताजी 
चरण स्पर्श
मैं जानती हूँ  , कि पिताजी मेरे द्वारा बोले गए कटु शब्दो से आपको बहुत बुरा लगा  है , और आप से माफी मांगने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रही हूँ। 

मैंने अपने  माता पिता रूपी सास - ससुर का सच मे बहुत दिल दुखाया है |
मुझे क्षमा करें .. 

में जानती हूँ की यह खत पढ़कर आपकी आंखों, में आंसू आ गए होंगे |
लेकिन मेरा उद्देश्य आपकी आखों में आसूं लाना नहीं अपितु अपनी भावना से अवगत कराना हैं |
पिताजी हमारा परिवार कितना खुशहाल हँसता खेलता परिवार था, लेकिन आज पता नहीं किसकी बुरी नजर लग गई  हमारे परिवार को ... 
आज   घर में आज  जो कुछ भी हुआ है  उसकी जिम्मेदार मैं हूँ...
  पिताजी गलती मेरी भी है  मुझे  पिंकी पर हाथ नहीं उठाना चाहिए था |
में जानती हूँ मुझसे गलती हुई है  , लेकिन  पिताजी आपने यह जानने की कोशिश की , कि मैंने यह  कदम क्यों उठाया है?? 
इतना बड़ा कदम उठाने के पीछे भी कोई ना कोई वजह तो जरूर होंगी ना.. 
आप ही बताइये क्या मैंने कभी ऐसा उद्दंड व्यवहार पहले कभी किया है?? 
क्या मेरी शादी के बाद अपने  घर मे कभी झगड़ा  या किसी बात को लेकर बहस हुई हे?? 

नहीं बहू बिलकुल नहीं,... 
बात तो तुमने बिलकुल सही कही।
है बहु...
तुम तो घर में अन्नपूर्णा , लक्ष्मी  सरस्वती  बनकर आई थी ...
रमेश बाबू खत पढ़ना छोड़कर बीच में ही बोल पड़े ! ! 
और अपने चेयर पर बैठे बैठे सोचने लगे कि कितना ख़ुशहाल  परिवार था मेरा.. 
सविता के परिवार में आने के बाद तो हमारा परिवार कितना खुशहाल हो गया 
कितने उत्साहित थे हम सब जब सविता को देखने गए थे |
गाँव की छोरी किन्तु पढ़ी लिखी और समझदार 
मायके में उसके मां बाप और एक छोटा भाई था |
  मध्य वर्गीय परिवार की लड़की थी
हमारी सविता  सांवली सी लड़की पर तीखे नेन नक्शे वाली ओर हमारा  विनोद भी सावलां सा मध्यम उचाई का था दोनों की जोड़ी खूब जम रही थी  
लेकिन आगे फेसला विनोद को लेना था
सविता और विनोद ने आपस में बातचीत कर ही यह फेसला लिया 
  वैसे सविता ने पहली नज़र में ही  विनोद का मन मोह लिया लेकिन सविता की बातें  विचारधारा और बोलने का सलीके से विनोद मंत्रमुग्ध हो गया
विनोद को सविता  बहुत पसंद आई ओर सविता को विनोद भी ..
फिर हमने वही दोनों का रोका कर दिया और देखते ही देखते सविता हमारी होने वाली बहु बन गई  |
और समय पंख लगाकर उड़ चला और तीन महीने का समय  यू चुटकियों में निकल गया
और विनोद और सविता की शादी का दिन आ गया|
सविता के पिता ने भी हमारे आव भगत में कोई कसर नहीं छोड़ी और उन्होंने भरपूर  मान सम्मान के साथ हमे विदा किया 
सविता ने भी हमें आदर और सम्मान  दिया  
रोज  सुबह सुबह छह बजे हमारे  कमरे में  आना  
ओर बकायदा माथे पर  पल्लू रखना ओर हमारे लिए चाय लाना ओर चरण स्पर्श करना.. 
पुरानी बातें याद आते ही पिताजी के आंखों से आंसू लुढ़क गये |
ओर पिताजी अतीत से वर्तमान में आ गए 
अपने आंसू पोंछ कर रमेश बाबू ख़त  को आगे पढ़ने लगे.... 
*****
रमेश  बाबू खत को पढ़ने लगे पीछे से शांति देवी ने कंधे पर हाथ रखा रमेश बाबु  सकपका गए तभी शांति देवी बोली रमेश बाबू  की ओर देखते हुए बोली आपकी आंख में आंसू.. 
रमेश बाबू ने आसू  पोछते हुए कहा नहीं बस आंख  में कचरा चले गया ओर आंख मलने लगे रमेश बाबू की आंखों से अनायास ही अश्रु धारा बह चली |
शांति देवी रमेश बाबू को चुप कराने लगी 
रमेश बाबू आगे  बोलते है शांति  क्या में वाकई में गलत हूँ  हमारे घर में जो कलह हुई   क्या इसमें मेरी भी गलती हैं ?? 
बिना झगड़े की वजह जाने मुझे बात का बतंगड नहीं बनाना चाहिए  यह कहते  हुए रमेश बाबू रो पड़े |
  शांति देवी रमेश बाबू को चुप कराती  है ओर कहती है जो कुछ भी हुआ उसमें गलती किसी की नहीं सिर्फ ओर सिर्फ हालात की है|
कौन माता पिता अपने बच्चों का बुरा चाहता है |तभी शांति देवी की नजर रमेश बाबू के हाथ में रखे खत पर पड़ती है|
शांति देवी वह खत रमेश बाबू के हाथ से ले लेती है और पुछती है आप यह क्या पढ़  रहे हैं ?? 
और खत रमेश बाबू के हाथ से लेकर वह खत  पड़ने बेठ जाती है |
खत पड़ते से ही शांति देवी की आँखे भी भर आती हैं रमेश बाबू  शांति देवी को समझाते हैं |
शांति सब ठीक हो जायेगा और शांति देवी के हाथ से खत लेकर पढ़ने लगते हैं  |
****
पिताजी पिंकी ने बहुत बड़ी गलती कर दी..
उसने जो व्यवहार किया है उसके लिए मैं उसे कभी माफ़ नहीं करूँगी

उस दिन पिंकी  के  हाथ में  दूध भरा गिलास था  ओर शिखा  से गलती से पिंकी को धक्का लगा गया  तभी पिंकी ने शिखा पर हाथ उठाया.. 
शिखा रोती रही पिंकी का इतने से भी जी नही भरा गुस्से से में आकर उसने शिखा पर तंज कसा ओर कहा तु तो लंगडी के साथ अंधी भी निकली.. 
तभी पीछे से चंदर भेया ओर बोले इस गिलास की भरपाई कोन करेंगा तेरा बाप... 
छोटी तो पराये घर से आई है कि लेकिन भैया तो अपने ही घर के है उनके मुॅह से इस तरह के शब्द सुनकर मुझे बहुत दुख हुआ ओर मेने चंदर भेया को चिल्लाया तभी  पिंकी बोलती है आपकी हिम्मत केसे हुई मेरे पति को चिल्लाने की पहले आप अपने निकम्मे, नाकारा पति को समभालिये, जो हमारे मुफ्त के तुकडो पर पलता है |
मुझसे मेरे पति की बेइज्जती  बर्दाश्त नहीं हुई
और मैंने पिंकी को  झन्नाटेदार चाटा रसीद किया  तभी उस वक्त आपका आना हुआ ओर आप कुछ सुने बिना ही भड़क गए यह सब विनोद से भी देखा नहीं गया इसलिए वह आप पर भड़क गए, ओर मेने बाद में आपसे ओर मां से बात करने की कोशिश भी की लेकिन आपने मेरी एक न सुनी इसलिए मजबुरन मुझे यह खत लिखना पढा़.. 

पिताजी ओर माताजी सोचने लगे कि पिंकी ओर चंदर के वयवहार से आहत होकर ही बहू ने धैर्य खो दिया..
ओर यह झगड़ा  इतना बड़  गया |
तभी शांति देवी बोलती है
हमारी  सविता बहुत ही समझदार मिलनासार है
किसी से किसी भी  प्रकार का कोई झगड़ा नहीं करना ओर  कलह  तो बहुत दूर की बात है 
मेरी बहु तो  रोते को भी हंसाने वालों में से हैं|
चंदन और सरिता में  भी कितनी बनती थी 
दोनों देवर भोजाई  कम दोस्त ज़्यादा थे
लेकिन आज एक दूसरे से बात तक नहीं करते तभी आगे शांति देवी बोलती है   पिंकी समूचे स्वभाव  की है उसे चंदर का किसी से भी ज़्यादा बात करना बिल्कुल पसंद नहीं है |
उसने  ही चंदर को भड़का दिया होंगा..
पता नहीं किस मनहूस घड़ी में हम इस पिंकी को  ब्याह लाये थे |
शांति देवी रमेश बाबू को शांत कराते हुए कहती हैं  कोई भी माँ बाप  ये नहीं चाहता कि  उसके परिवार का बटवारा हो ..
सविता को में बहुत अच्छे से जानती हूँ वो सब कुछ बर्दाश्त कर सकती है लेकिन अगर उसके परिवार के खिलाफ कोई आवाज उठाये तो वो कतई बर्दाश्त नहीं करेंगी और आज तो बात उसके पति ओर बेटी की  हैं |
आप तो जानते ही हो इन तीन  महीनों में सविता ने  क्या कुछ नहीं झेला !! 
हमें तो यह लगा था कि हमने विनोद और शिखा को खो दिया है लेकिन सविता का खुद पर भरोसा ओर भगवान पर अटूट श्रद्धा ही थी कि वह अपने पति और बेटी को मौत के मुंह से बचा लाई।
याद है वह मनहूस दिन जब विनोद ओर शिखा का एक्सिडेंट हुआ !!
हम सब तो बहुत टुट  कर हिम्मत हार चुके थे लेकिन वो सविता ही थी जिसने   हमें हौसला दिया ओर  खुद  भी कभी हिम्मत नहीं हारी |
उसके साहस और हौसले और भगवान पर  अटूट श्रद्धा की वजह से  ही आज विनोद और शिखा हमारे बीच में है |
और सविता  हर कदम पर अपने पति और बेटी का  सहारा बनी । 
और आज सविता की ही हिम्मत से सब हुआ है विनोद ओर शिखा अपने पैरों पर खड़े  हुए है 
बड़ी मुश्किल से सविता ने  अपने पति और बेटी  में   आत्मविश्वास जगाया है और पिंकी ओर चंदर ने एक ही झटके में उनके आत्मविश्वास को डगमगा  दिया!!
सविता की जगह कोई और भी होती है तो वो भी यही करते जो सविता ने किया वह गलत नहीं है  | तभी कुछ देर रुक कर शांति देवी बोलती है
  उस दिन घर के झगड़े के बारे में , में भी कुछ नहीं जानती थी..
रात में मैंने  चंदर  ओर विनोद से  भी पूछा लेकिन  उन दोनों ने  कुछ नहीं बोला..
और सविता  ने आपका अनादर किया था इसीलिए मैंने गुस्से में सविता की एक भी बात  न सुनी |
उस समय  मुझे  सविता  की बात सुननी चाहिए थी |
मेने पिंकी से भी बात करी तो वह  कहने लगी  चंदर पिछले तीन महीने से घर का खर्च उठा रहे है उन्होंने कभी कुछ कहा क्या ???
नहीं ना!! 
घर में सिर्फ चंदन को ही सैलरी अच्छी मिलती है पूरा घर चंदर  की कमाई से ही चलता है ,  हमे बजट के साथ चलना चाहिए 
शिखा ने  ग्लास तोड़ दिया और आये दिन कुछ न कुछ नुकसान कर  देती है हम अभी से उसे नहीं  सिखायेंगे तो  वह कैसे सीखेंगी..
हम ये  फिजूल खर्चे पर काबू नहीं करेंगे तो फिर घर खर्च कैसे चलेंगा..
ओर अगर चंदर ने कुछ कह भी दिया तो सविता भाभी को नाराज होने की कोई ज़रुरत ही नहीं थी  जो व्यक्ति कमाकर खिलाएगा तो क्या वह थोड़ा गुस्सा नहीं दिखा सकता लेकिन सविता भाभी ने तो बात का बतंगड़ बनाके रख दिया है |
मुझे सत्रह बात सुनाते हुए पिंकी  अपने कमरे में चली  गयी। 
हमारी सविता बहुत भोली है और उसे किसी पर  तंज कसना तो उसे बिलकुल नहीं आता 
आपको पता है , जब सविता की नई नई शादी हुई थी तो वह कितना लाज और शर्म करती थी 
कभी किसी  को पलट कर  जवाब नहीं देना ..
ओर अपने घर गृहस्ती के कार्यों में लगे रहना कहीं आस - पड़ोस में जाकर बैठना तो उसकी आदत ही नहीं थी..
मैंने उसे कितनी बार समझाया  बेटा आस पड़ोस में भी बातचीत करा करो जान पहचान बढ़ेगी |
लेकिन  वह बड़े प्यार से बोलती मम्मी जी मुझे लोगों के घर जाना और  इधर उधर की चुगली करना  पसंद नहीं  हैं|
वो तो मैं ही एक बार  जबरदस्ती करके सविता को  पड़ोस में  मिश्राइन के घर ले गई..
उस समय सविता और मिश्राइन की बहु , दोनों की नई नई शादी हुई थी  लेकिन मिश्राइन की बहू ने तो सविता के सामने अपने सारे घर भर की बुराई का पिटारा खोल दिया.. 
सविता उस समय तो मिश्राइन की बहु से कुछ नहीं बोली लेकिन सविता ने आकर मुझसे कह दिया मम्मी कितनी  ओछी बात होती है ना  
रहना परिवार वालों के साथ  है और बाहर वालो से उनकी ही बुराई करना..  
तभी रमेश बाबू बोलते हैं , मैं मानता हूँ शांति सविता बहुत अच्छी हैं ..
अच्छी तो  पिंकी भी  है लेकिन  थोड़ी नासमझ हैं किसी के भी भड़कावे में आकर कुछ भी बोल देती है..
लेकिन पिंकी भी दिल की बुरी नहीं हैं |
यह कहते हुए  दोनों  हंसने लगे..
तभी शांति देवी बोलती हैं आपकी बहु पिंकी इतनी भी अच्छी नहीं है , मैं एक बार पिंकी को भी  मिश्राइन के घर लेकर  गयी थी तभी पिंकी के सामने भी मिश्राइन की बहु की वही खटरपटर चालू हो गई ..
लेकिन आपकी बहु पिंकी तो पिंकी है,
मिश्राइन की बहु को बोली.. 
जब तुम्हारे  परिवार वाले तुम्हारे साथ अच्छे से नहीं रहते तो तुम अलग क्यों नहीं हो जाती..
दूसरे दिन ही मिश्राइन की बहु अलग हो गयी ..
मिश्राइन ठहरी उल्टी खोपड़ियां की सारी तोहमत हमारे सिर पर दे रही थी और बोले कि यह अलग होने का पाठ तुम्हारी बहुत पिंकी ने हीं हमारी बहू को पढ़ाया है |
फिर  मैंने भी उसको कह दिया तुम्हारी बहु कोई दूध पीती बच्ची नहीं है जो हमारे पिंकी उसको कुछ सिखा पढ़ा देंगी.. 
मैंने भी साफ़ कह दिया आजकल  की बहुएं ज्यादा समझदार होती है , अपना  काम निकालती है और तोहमत दूसरों  को देती है |
मिश्राइन उलटे पैर भागते बनी.. 
अब बताओ किसी की बहू को ऐसी राय दी जाती है क्या लेकिन पिंकी एक नंबर की नासमझ और बोडम है . 
और पता है एक बार  मिश्राइन की बहु ओर पिंकी बात कर रहे थे तभी मैंने चुपके से ध्यान लगाकर   इन दोनों की बातें सुनी..
  मिश्राइन की बहु पिंकी को पाठ पढ़ा रही थी कि तुम भी अब अलग हो जाओ ..
हमको देखो हम अब कितने मज़े में रह रहे है , तुम क्या ज़िन्दगी भर अपनी सास और जेठानी की हा में हा मिलाते  रहोंगी.. 
तुम भी अपनी अलग पहचान बनाओ |
  मैंने यह बात सुन ली  मैंने सविता को भी बताया सविता ने मुझे यही कहा जाने दीजिये मम्मी  पिंकी नासमझ  है  लेकिन वह घर तोड़ने वाली औरतों  में से  नहीं है|
लेकिन मेने  फिर भी चंदर को बोलकर पिंकी और मिश्राइन की बहू की बात बंद करवा दी ..
और मिश्राइन की बहू का अपने घर में आना जाना भी बंद करवा दिया
तभी रमेश बाबू बोलते है  देखो  शांति यह सब तो मिथ्य बातें हैं।
जिस बहु को घर तोड़ना और अलग होना रहता है वह किसी की नहीं सुनती अपने मन की ही करती है, और तोहमत दूसरो के माथे पर रखती है |
यह तो समझ स्वयं बहू को होनी चाहिए कि कौन उसे घर बनाने की सीख दे रहा है और कोन  घर तोड़ने की.. 
रमेश  बाबू आगे बोलते है ,और यह बात तो एक समझदार बहु  को खुद ही समझनी चाहिए कि उसे उसके घर को तोड़ना है या प्यार के धागो से मजबूती  से  हर रिश्ते को  बनाये रखना है |
और रही बात  मेरी कमाई की तो मेरी नौकरी पर ही लोन उठाकर  चन्दर के बिजनेस  और शिखा ओर विनोद के इलाज में ही सारे पैसे चले गए.. 
ओर ब्याज कट पीट कर जो मिलता है उससे ही थोड़ा घर का खर्चा पानी निकल जाता है ..
शांति तुम तो जानती हो कि दो साल बाद मेरा  रिटायरमेंट है उमर के इस मोड़ पर  अब मुझसे भी  काम नहीं बनता है। ओर जैसे तैसे गाड़ी धक रही हैं |
अपने काम के बोझ  तले दबे होने के कारण ही समझ नहीं पाया ओर जब मैं घर आया तो मैंने देखा कि सविता  ने पिंकी  को चाटा मारा और विनोद चंदर की कॉलर पकड़  रहा है,
ओर मुझसे यह सब देखा नहीं गया और मेने गुस्से से दोनों बेटों से पूछा  भी क्या हुआ तो वो कुछ नहीं बोले ओर फिर विनोद बोलने लगा आप मुझमें और चंदर में फर्क करते है , ओर सविता भी तेश में आकर कहने लगी ..
मे  अब इस घर में पिंकी के साथ में नही रहूंगी आप इस घर का बंटवारा करो ओर इस पिंकी को हमसे अलग कीजिये |
तभी मैंने भी गुस्से में कह दिया ये मेरा घर है तुम   सब निकल जाओ 
और तभी विनोद ने भी कहा मुझे भी इन सबकी शक्ल नहीं देखनी है और अब मैं  जा रहा हूँ इस घर से लेकिन सविता ने मना कर दिया और बोली  हम नहीं जाएंगे!! 
इस घर से, मैं पिंकी से अलग होना चाहती हूँ माँ ओर पिताजी से नहीं..
तभी चंदर  जोर से चिल्लाते हुए बोलता है , तो क्या ये घर हमारा नहीं है  हम भी इस घर में ही रहेंगे।
यहां से कहीं नहीं जाने वाले ..
पिंकी भी बोल पड़ती है लेकिन मैं भी सविता भाभी के साथ नहीं रह सकती । 
अब तो सिर्फ एक ही उपाय बचा है और वो है  
इस घर का बंटवारा..
तभी रमेश कहते हैं शांति क्या इन समस्याओं का कोई उपाय नहीं है ...
तभी कुछ देर सोचते हुए शांति देवी बोलती है एक उपाय  है और वो यह  है कि हम दोनों बहु का किचन अलग अलग कर दे.
ये क्या कह रही हो तुम शांति ...
यह भी तो बंटवारा ही हुआ न..
आप मेरी बात पर जरा ध्यान दे  में बस आपको  दोनों  के किचन अलग करने का बोल रहीं हूँ..
इससे दोनों अपने पति और बच्चे के हिसाब से खाना बना सकती है |
ओर अगर हमने किचन अलग नहीं  किया तो  हमें घर का बटवारा करना पढे़गा |
और घर का बंटवारा करना मतलब घर का आधा हिस्सा दोनों को दे देना और अगर  हम घर के दो हिस्से कर देंगे तो हम कहाँ जायेंगे ??
यह कहते हुए शांति देवी रो पड़ी। 
रमेश बाबू  शांति देवी को चुप कराते हुए बोलते है ठीक है..
हम दोनों के किचन अलग अलग करवा देते  हैं |
तभी रमेश बाबू आगे खत को पढ़ते हैं |
सविता आगे बोलती है,मैं भी इस घर की बड़ी बहु हूँ ओर मुझे भी मान - सम्मान मिलना चाहिए | लेकिन पिंकी ने इन तीन महिनो में  मेरा बहुत अपमान किया है ।  
मैंने सब सहा  लेकिन जब बात मेरे पति  और बच्ची की आई  तो मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ |
आप ही बताये क्या मैंने कभी अपनी जिम्मेदारी नही निभाई |
मैं तो पिंकी के हर ताने सुनने के बाद भी उसकी हर बातों को नज़र अंदाज़ करती रही..
लेकिन हर चीज़ की एक हद होती हैं| 
तभी रमेश बाबू  खत पढ़ना छोड़कर बीच में ही शांति देवी से  बोलते हैं  सविता ने बात  बिल्कुल सही कही है  वह अपनी जिम्मेदारियां बखूबी निभाती आई हैं  इस घर को उसने कभी ससुराल नहीं समझा..
सविता की शादी के बाद हमें कभी ऐसा लगा ही नहीं कि हमारे घर मे बहु आई है वह हमेशा बेटी बनकर ही रही .. 
तभी  शांति देवी बोलती है, सविता की शादी को तेरह साल हो गये कभी दो चार काम ज्यादा  भी कर लेती तो कुछ नहीं बोलती 
लेकिन अगर पिंकी ने कभी  ज्यादा काम कर लिया तो अपनी मां को फोन करके  सबसे पहले  बताएंगी आज मेने इतना काम किया ... 
मुझे भी बताएंगी  आज काम बहुत ज़्यादा  था
ओर चंदर के आते ही शुरू हो जाएंगी  सुबह  से शाम  काम  मे ही निकल जाती हैं|
   मैंने  सविता से कहा भी पिंकी को  भी अपनी जिम्मेदारी का अहसास दिलवाये .. 
लेकिन सविता बोलती है  जाने दो मम्मी अभी कायरव छोटा हैं ,  जब कायरव बड़ा हो जायेंगा 
तब उसे खुद ज़िम्मेदारी का अहसास हो जायेंगा |  कुछ देर रुककर शांति देवी बोलती है आपकी तो सरकारी नौकरी  है, सुबह दस बजे से घर से निकल जाते हैं और शाम को छह बजे घर आते हो..
आपको क्या मालुम औरतो की घर गृहस्ती कैसे चलती है |
सविता सुबह से लेकर शाम तक एक जैसी लगी रहती है , मैं तो अब भी यही कहूंगी कि अच्छा ही है अब दोनों अलग हो जाएं .
कम से कम पिंकी को  अपनी जिम्मेदारी का अहसास तो होंगा..
तभी रमेश बाबू आगे खत  पढ़ते हैं , पिताजी में बस  इतना ही कहना चाहुंगी कि 
मैं स्वार्थी नहीं हूँ ओर  मैं सिर्फ यही चाहती हूं कि घर में कोई भी मेरे पति की कमाई का मजाक ना बनाये  वो अब जितना भी कमाएँगे हम उसमें  घर गृहस्ती कुशलता पूर्वक चला लेंगे । 
पिताजी मे पिंकी से अलग होना चाहती हूँ 
आप से  या मम्मी से नहीं और मैं हमेशा से अपने परिवार के साथ  रहना चाहती  हूँ 
पर पिताजी आप पिंकी को अलग कर दीजिये हम आपके साथ ही रहना चाहेंगे और हमारे लिए भी  यह सौभाग्य की बात होंगी कि आप हमारे साथ रहेंगे | 
मुझसे जाने अनजाने में कोई  भी गलती हुई हो तो मुझे क्षमा करे |

      🙏🙏🙏आपकी सविता 🙏🙏🙏

रमेश बाबू ख़त को मोड़कर रख देते हैं ओर फिर शांति देवी से बोलते हैं , शांति मैं सविता का दुख समझता हूँ |
  में कल सुबह ही चंदर को बोलकर पिंकी का किचन अलग करवा दूंगा..
ओर आगे रमेश बाबू बोलते हैं लेकिन पिंकी  भी दिल की बुरी नहीं हैं। 
शांति देवी बोलती है  पिंकी को उसकी माँ की ही सीख होंगी ..
पिंकी घंटों अपनी माँ से फ़ोन पर बातें किया करती है और अपने घर की एक एक बात अपनी माँ को बताया करती है उसकी माँ ने हीं यह बात उसके दिमाग में डाला होगी ..
घर में झगड़े करो तो सब घरवाले अपने आप ही खुद तुझे अलग कर देंगे और तेरे पति की कमाई भी बच जायेगी ...
वही पिंकी का घर बसने नहीं दे रही हैं और एक बार तो  वह अपनी माँ से फोन पर बोल रही थी  , की अभी तो कायरव छोटा है इसलिए सबकी सत्रह बात सुनती हो जब कायरव बड़ा हो जायेंगा फिर तो मैं किसी एक  बात नहीं सुनूंगी ..
सीधी अलग हो जाउंगी..
मेने यह बात सुन ली ओर जब मैंने इस बारे में उससे बात करी तो वह मुझसे कहने लगी कि आप मुझ पर नज़र रखते हो!!!!
मैंने पिंकी को इस बात पर फटकारा भी तो वह कहती हैं जरूर सविता भाभी ने ही आपके कान भरे होंगे..
वह भी तो अपने मायके बात करती है ,मैंने तो कभी ये नहीं कहा कि वह क्या बात करती हैं??
तो आप मेरी बात पर क्यों ध्यान देते हो?
मैंने उसबात के बाद से पिंकी को कुछ नहीं कहा!! 
  मेरी  ही गलती थी अगर मैं उस समय पिंकी ओर  सविता की आपस में बातचीत करा देती तो शायद आज पिंकी की हिम्मत इतनी नहीं बढती.. 
वह दोनों कुछ बोलने वाले होते हो कि शांति देवी की नजर  दरवाजे पर पड़ती है ओर दरवाजे के बाहर पिंकी खड़ी  रहती हैं |.. 
क्रमश:

पिंकी को देखकर रमेश बाबू ओर शांति देवी दोनों ही  चुप हो जाते है|
पिंकी  कमरे के अंदर आ जाती है ओर  अपने सांस  ससुर से गुस्से मे कहती हैं ..
वाह मम्मी - पापा  वाह आपने मेरे बारे में ये कैसी सोच बना रखी है , और अब तो आप पापा जी को भी  मेरे खिलाफ भड़का रही है ..
यह बोलते हुए पिंकी रो पड़ी..
पापा जी जब देखो तब मम्मी हमेशा सविता भाभी का ही पक्ष लेती  है |
तभी शांति देवी बोलती है , पिंकी तुम  छुप - छुप कर हमारी बात सुन रही हो क्या यह  हम पर नजर रखना नहीं हुआ???
वाह मम्मी वाह एक तो चोरी उपर से सीना जोरी में तो यहां आपके ओर पापा के लिए  दूध लेकर आई थी । लेकिन मैं आज आपकी जो मेरे प्रति सोच  है उसे देखकर मैं बहुत  आहत हूँ  |
मम्मी जी को तो मे हर बात में ही  गलत लगती हूँ  लेकिन आज तो मम्मी जी ने मेरी मम्मी के बारे में भी अपशब्द कहे है , मेरी मम्मी बहुत अच्छी है और मे उन के खिलाफ एक शब्द नहीं सुनुंगी ....
तभी पीछे से सविता आ जाती हैं और  बोलती हैं 
तो मैं भी अपनी मम्मी के खिलाफ एक शब्द नहीं सुनुंगी और शांति  देवी के गले लग जाती हैं 
तो रहो अपनी मम्मी के साथ पिंकी गुस्से से बोलती हैं  ओर कहती है में अब इस घर में नहीं रहूँगी..
मैं जा रही हूँ  मेरी मम्मी के घर.. 
ओर कमरे से बाहर निकल जाती है  |
चंदर पिंकी को रोकने की कोशिश करता है 
लेकिन वह नहीं रूकती ओर जाते- जाते बोलकर  जाती है , मे इस घर में तब तक कदम नहीं रखुंगी जब  तक तुम अपने परिवार से अलग नहीं होते...
और टैक्सी पकड़ कर चली जाती है.
इधर शांति देवी ओर रमेश बाबू सविता को आश्चर्य भरी नज़र से देखते हैं |
शांति देवी पूछती है अरे सविता तुम कब आई??? तुम तो कुछ दिन ओर  मायके में रहने वाली थी 
सविता ने कहा मम्मी यह मुझे आॅफिस से आते वक्त ही  मायके से ले आए  और यह बता रहे थे। कि आपकी तबीयत भी  ठीक नहीं है, इसलिए मैं आ गयी। 
सविता की नजर खत पर पड़ी जाती है 
मम्मी, पापा आप मुझे माफ कर दीजिए 
यह बोलते हुए सविता  पश्चाताप के आंसू रोने लगी..
दोनों ने सविता को  चुप कराते हुए कहा कोई बात नहीं बेटा जो कुछ भी  हुआ उसमे  तुम्हारी गलती  नहीं है हमने वह खत पढ़ लिया है ..
जाने अंजाने में बहु मुझ से भी गलती हुई हैं  
मैंने तुम्हारे साथ बहुत अन्याय किया  है यह बोलते हुए रमेश बाबू भावुक हो उठते हैं 
सविता  भी भावुक होकर बोलती है, नहीं  पापा इन सब में आपकी कोई गलत नहीं है..
गलती हालात की  है ।
तभी शिखा आती है, ओर कहती है  मम्मा मुझे नींद आ रही हे आप चलिए ना 
सविता शिखा को अपने कमरे में ले जाती है |
शिखा को सुलाकर सविता यू मायूस सी वही बेठ जाती हैं  तभी विनोद सविता से पूछता है क्या बात है सविता तुम ठीक तो हो??
सविता विनोद के गले मिलकर फफक़ पड़ती है| विनोद सविता को चुप कराते हुए पुछता है सविता क्या बात है मुझे बताओ.. 
सविता बोलती है अपने घर में उस दिन झगड़ा हुआ था उसके बाद रात के समय मम्मी का फोन आया तो मेने मम्मी को सारी बात बताई.. 
मम्मी  की भी तबियत ख़राब थी ओर मे उस समय बहुत टेंशन में थी  तो मम्मी ने मुझसे कहा बेटी थोडे़ दिन के लिए यहाँ मायके आ जा मुझे भी अच्छा लगेगां ओर तेरा  मन भी ओरसा जाएंगा..
कुछ दिन यहाँ रह जाना..
मम्मी की स्थिति मुझे मालूम है  वह हमैशा बीमार ही रहती है तो मेने भी सोचा मायके जाकर  कुछ दिन आराम कर लूंगी..
दुसरे दिन कुशल मुझे लेने आ गया ..
मैं उसके साथ चली गयी..
एक दिन तो मुझे अच्छा लगा  ओर वहा सब ठीक था  
दूसरे दिन भाभी ने पापा को चाय लाकर दी 
पापा ने सिर्फ इतना ही कहा  कि बेटी चाय में शक्कर ज्यादा है ..
फिर क्या था भाभी शुरू हो गयी पापा से बोलने लगी आपको तो मेरी हर चीज़ में प्रॉब्लम है कभी आपको शककर ज्यादा लगती है तो कभी कम
में और माँ भाभी का चेहरा देखते रह गए 
तभी शिखा से  पानी भरा गिलास गिर गया 
फिर  से चिल्लाती हुई भाभी किचन से बाहर आई..
ये बच्चों ने तो उत्पात मचाना शुरू कर दिया है
नाक में दम कर रखा है मेरे ...
मे अकेले किस किस को संभालू और पिताजी से  बोली मुझसे नहीं करी जाती है ये मेहमानों की आवाजाही..
मुझे तो अलग रहना है  अब बस बहुत हो गई आप सब की सेवा..
मैं  मायूस होकर भाभी का मुंह देखने लगी ..
मेने भाभी से कहाँ भी  छोटी छोटी बातों पर यूं अलग होने की बात नहीं करते हैं भाभी  तो वह मुझे ही बोली आप अपना घर संभालिये हमारे मामले में मत बोलिये |
में टका सा मुँह लेकर भाभी की ओर देखने लगी मेरे मां और पिता हिस्सा बंटवारे के नाम पर रो रहे थे  |
मैंने मां से बात करने की कोशिश भी करी 
माँ  से कहा भी भाभी  तो पहले कभी ऐसी नहीं थी 
अचानक से भाभी को क्या हो गया है
जो तेरा - मेरा कर रही हैं , भाभी तो निस्वार्थ  भाव से आप दोनों की सेवा कर रही थी फिर भाभी की सोच ऐसी कैसे हो गयी.. 
मम्मी ने  कहाँ देखो बेटा ये कलयुग है यहाँ सब कुछ हो सकता है अब बेटा तू अपने  ऊपर से ही
लेले..
बेटा सविता तू तेरे सास ससुर की कितनी निस्वार्थ भाव से सेवा करती थी,लेकिन तेरी देवरानी के आने के बाद तेरे मन में भी यह ख्याल आया न कि सब तुम ही क्यों करे उसका भी तो  परिवार है वह भी सबकी सेवा करें..
बेटा ये बता जब तेरी   जापा - जच़की  ( डिलीवरी) हुई तो तेरी सांस ने तुझे कोई तकलीफ दी...
नहीं  माँ बिलकुल नहीं...
मम्मी ने तो मुझे बहुत प्यार दिया ओर बड़ा खुश रखा ..
बिल्कुल आपकी तरह..
तो बेटा अब यह सोच ले अगर तेरी देवरानी का बच्चा छोटा हैं और अगर तुमनें  दो चार काम ज्यादा कर लिये तो क्या पहाड़ टूट जाएगा ??
नहीं ना तो बैटा  फिर अपनी देवरानी से इकसा क्यों करती है??
जबसे तेरे देवर ही शादी हुई है तुझे देवरानी का टेंशन हो गया है .. 
उसकी शादी को अभी पांच साल ही हुए है उसका बच्चा छोटा है   
और बेटा तू पल - पल की खबर , अपने ससुराल की हर  बात यहाँ मायके में बताती है..
तो कभी भाभी को बताती है बेटा आज वही तुझे बोलने से नहीं चुकी 
बेटी परेशानी हर इंसान की जिंदगी में रहती है लेकिन इंसान को उसका हल समझदारी से निकालना चाहिए |
अपनी माँ से यह बात सुनकर   मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ  मेने  पिताजी से बंटवारे की बात करी ओर हम सबने  उनके दिल को कितनी ठेस पहुँचाई है तब मुझे लगा हुआ की मैंने कितना बड़ा पाप किया है और मुझसे  गलती हुई है अब मुझे अपनी गलती का पश्चाताप हो गया है इसलिए मैंने सुबह से आपको फ़ोन करके बुला लिया और यहां आकर मम्मी पापा से माफी मांग कर अपनी गलती का  पश्चाताप किया |

सविता का परिवार फिर से खुशहाल हो गया |
रमेश बाबू ने  सविता को माफ कर दिया 
पिंकी के लिए अलग किचन बनवा दिया गया। पिंकी को  मायके गए हुए आठ -दस दिन हो गए चंदर  ने पिंकी से फोन पर बात करने की कोशिश की लेकिन  पिंकी  ही उससे बात नही करना चाहती है |
हर बार चंदर का फोन काट देती 
एक दिन  सुबह सुबह पिंकी  अचानक ही सीढ़ियों  पर से  फिसलकर गिर गयी
उसे  हॉस्पिटल ले जाया गया वहा डाक्टर से पता चला कि पिंकी के पैर की हड्डी में क्रेक आ गया है |
पिंकी के पेर में प्लास्टर बांधा गया ओर  एक महिने  बाद ही   तुम ठीक से चल पाओंगी डाक्टर ने सख्त हिदायत दी ..
ओर एक महिने तुम सिर्फ आराम ही करोंपंगी  पिंकी की मां ने आठ दस दिन तो पिंकी खूब सेवा करी 

लेकिन पिंकी की अकड़ अभी भी कम नहीं हुई 
आये दिन मा को परेशान करना ..
माँ तुमने ये ऐसा  नही बनाया है 
वो वेसा नहीं करा.. 
ओर उसने अभी तक चन्दर से एक भी बार बात नहीं की..
एक दिन पिंकी की माँ ने पिंकी से पूछ ही लिया 
क्या बात है पिंकी  अब चंदर बाबू का फोन नहीं आता है क्या ?? 
पिंकी मुसकुराती हुई बोली नहीं माँ इनके फोन तो रोज आते है लेकिन मैं ही बात नहीं करती हूँ
माँ मे अब उस घर में वापस नहीं जाऊंगी में अब यही तुम्हारे पास ही रहुंगी
ओर कायरव  का एडमिशन भी यही पास ही के  स्कूल में करवा लूंगी 
पिंकी की माँ यह बात सुनकर साफ साफ  पिंकी से बोली देख बेटी , छोरी अपने ससुराल में ही अच्छी लगती है मायके में नहीं
आखिर पिंकी की माँ भी बुजुर्ग थी आज हे कल नहीं अब माँ ने भी साफ - साफ कह दिया 
पिंक बेटा तुझे मदद की जरूरत है इसलिए में तेरी सेवा, मदद जरूर करूंगी 
बेटा तेरे पेर का फ्रेक्चर सही हो जाए फिर तूम सीधे अपने ससुराल जाओगी माँ ने उसे आदेश दिया |
पिंकी मां की बात सुनकर आवक  सी रह गई 
पिंकी गुस्से से रोती हुई बोली ठीक है माँ आज मुझे पता चल गया है मेरा असली घर मेरा ससुराल ही है  
अगर तुम्हें मेरी परवाह ही नहीं थी तो मेरे ससुराल में फ़ोन करके मेरी इतनी क्यों चिंता करती थी
बेटा मैं तेरी बात इसलिए सुनती हूँ कि तेरे मन मे कोई बोझ नही रहे लेकिन मुझे नहीं पता था कि तेरे मन में अपने ससुराल के प्रति  इतना जहर भर गया है और यह बात बेटी तू खुद बता  मैंने कभी तुझे कहाँ है  की अपने ससुराल वालों के साथ बुरा  व्यवहार करो या अलग हो जा..
यह तेरी अपनी सोच है और  मैं अच्छी तरीके से जानती हूँ कि तू किसी का कहना नहीं मानती।
   पिंकी मैं अभी भी तुम्हे सलाह देना चाहूँगी की अभी भी वक्त है पिंकी अपने घर को टूटने से बचा लो.. 
तभी पिंकी ने अपनी माँ को गले लगा लिया ओर बोली माँ मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है  आपने मेरी आखें खोल दी उसने चंदर  को फोन लगाया और उससे माफी मांगी 
और  दूसरे दिन चंदर के साथ अपने घर आ गई
घर में जब सबने पिंकी  की हालत देखी तो  सबको बहुत बुरा लगा.. 
सविता ने जाकर पिंकी  को गले लगा लिया
पिंकी सबके पास जाकर  पैरों में गिर कर माफी मांगने लगी   सबने उसे  रोक कर  गले से लगा लिया  ओर सबने पिंकी को माफ कर दिया |
   रमेश बाबू का परिवार हंसी खुशी साथ साथ रहने लगा
धीरे धीरे पिंकी भी हर काम में  निपुण हो गई
ओर अपनी जेठानी सविता की तरह ही  अपने सास ससुर की निस्वार्थ सेवा करने लगी
***"
कुछ समय बाद राखी का त्यौहार आया
सविता भी अपने मायके गई 
वहाँ जाकर सविता ने देखा की भाई , भाभी  ओर  माँ पापा  सब आपस में बैठ कर बातचीत कर रहे हैं सविता को देखकर सभी बहुत खुश हुए
सविता ने अपनी माँ से पूछा तो उसकी माँ ने कहाँ बेटा हमने यहाँ सब नाटक किया था तुझे तेरी गलती का पश्चाताप कराने के लिए .. 
तभी सविता की भाभी पीछे से आती है और सविता अपनी भाभी के गले लगकर रो पड़ती है |
                  
                        🙏🙏समाप्त🙏🙏
                               काजल हर्ष