बैचैनी सी क्यूं जी रहे हो
मौत को गले लगाये
जिंदगी क्यु माँग रहे हो...
राहतो से न जाने कितने दुर हुये है..
बैचैनी से अपना एक रिश्ता बना हैं..
चाहतो की वादियाँ लौ गाफीर हुयी
गुस्ताख दिल फिर बेपर्वा हो चला हैं
उंची गिरोह से झाक कर देख रहे हो
गुजर रहे राहगीर मै कोई अपना न हो
दुर से ही दिल नवाजी खुब कर रहे
हाल पुछने का यह तरिका भी खुब हैं
बैचैन दिल का वास्ता नही अब जिनसे
वोह भी आज युही तिलमिला रहे हैं..
दिल गुस्तखीयाँ तू कुछ कम कर ले
राह तो अकेले की हमे थी काटनी
साथ मै वादियाँ करवट लेने लगी...
बैंचैन दिल की धडकन सुन रही लो
बदल गयी जमाने शिशे मै हमारी शक्ल
राहतो की गलियोंकी फीराक मै ये दिल
तू खो चला अपनी तस्विर ए एहमित...
ना भुलकर जिया जाये ना यादोसे..
हल्की हल्की मायुसी झलक रही जो
कही इस बैचैन दिल की नाराजगी तो नही..
जो तेरेलिये तेरेसा बर्ताव कर रही जो
वो तेरी ही हम राही वो साँसे तो नही
जो कभी हमारे नाम लिख दी तुने..
बैचैन गलियोंकी तोहमते लिये
युही कभी रातो की सिलवटो मै ढुंढती
अपनोंकी की ताबिर याद दिलाती..
नजर शायाद उन्ही बैचैन बेसब्र पल को याद किये जा रही..
ये दिल बता तू मेरा है या उस दुश्मन का ..
जो दिये की लौं मै आज भी जिन्दा हैं...
✍@sari
सारिका ऐवले..

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