गँगा सी पवित्रता लेकर "
एक दर्पण बन जाऊँ मै।
माँ गँगा को दूषित करते "
फिर कैसे बचा पाऊँ मै।।
जो तरसे अपनो से बिछुड कर"
उनकी आँखे नम सी है।
जिन्हें मिली है सारी खुशियाँ"
उनके लिए कुछ कम सी है।।
न पकडेगे हाथ किसी का "
न किसी का छोडेगे।।
खुद न उठना चाहेंगे "
न तुमको उठने देगे।।
जाने बचपन कहा खो गया"
भटके भूलभुलैया में।।
ढूढे प्रतिबिम्ब कहा अब अपना"
दर्पण के चौखाने में।
हमसे अच्छा दर्पण है जो "
झूठी उम्मीद नही देता।।
खुद टूट जाता है लेकिन "
बचपन नही खोता।
इसाँनियत ,बची कहाँ है"
लूट मची बाजारो मे।।
नजर छुपाकर ,दूर खडा है"
क्यू ,इन्सा ,बैगानो मे।।।
रीमा महेन्द्र ठाकुर

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