अभी -अभी दिल में उसके एक हूक सी उठी है,
स्त्री होने की जैसे सजा सी मिली है ।
होकर खुद से बेपरवाह,
दिल में सबकी परवाह जगी है।
खोकर अपनी मुस्कान,
चेहरे पे सबके वो मुस्कान सी खिली है।
चुराकर अपनों के अश्क सारे,
छिपकर उसकी आंखों से बही है।
जब लगे कदम उसके थकने,
रात की नीरवता में सोचे........
धरा भी तो हम सबका भार उठाए खड़ी है ।
भूलकर अपनी पीड़ा मुस्कुराती हुई.......
वो फिर से,
अपने कर्म -पथ पर अग्रसर हुई है ।
कल्याणी दास

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