दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई 
काहे को घड़ी बनाई
तूने काहे को घड़ी बनाई

काहे बनाये तूने घड़ी में कांटे
हर सेकेंड आगे ये बढ़ते जाते
जाने क्यूं तूने घन्टे,मिनिट बनाये
टिकटिक करते आगे बढ़ते ही जाये
फुरसत मैं जब भी चाहूं
घड़ी ने आँखे दिखाई

तूने काहे को घड़ी बनाई

सात दिनों में एक संडे है आया
छुट्टी का इकलौता दिन हमने पाया
चालीस घन्टों का जो ये दिन बनाता
खुश हो जाते सारे तेरा क्या जाता
काश संडे न बीते
छुट्टी ही छुट्टी हो भाई

तूने काहे को घड़ी बनाई
तूने काहे को घड़ी बनाई

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      –प्रीति ताम्रकार
        जबलपुर