प्रारम्भ हुई नव ज्योति किरण की,
विरत निशा की अंधियारा।
आरंभ हुई रश्मि वर्ण रजत की,
वसुधा जगमग सी उजियारा।
कुजत खग चहु दिशा में,
गूंजती गीत सुर की सरगम।
धवल धारा की आभा में,
अरुणोदय की शुभ समागम।
मंद बयार सुरसुर सी बहती,
मलय वात की देती परिमल।
प्रभात फेरी की मृदुल ध्वनि,
तनु चित्त करती पावन निर्मल।
रक्तांचल ओढ़े मंदार प्रभा,
तुंग क्षितज के तल बिखरी।
स्वर्ण द्युती की फैली लाली,
खिली पुष्प सी मही निखरी।
सतेश देव पाण्डेय

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