वो  बरामदे वो झरोखे ओर चौखट
आज भी बुलाती हैं काकी की चौकी
गलियारे में बैठी राम राम  करती बूढ़ी दादी
घर के आंगन में पसरा वो दाना बाबा का
उधड़े रंग का मीठे पानी वाला वो हैंडपम्प
पुरानी होती कुईं के पानी का पिलाना
छपरी का वो घिसा घिसा से कोल्हू
सबके संग बतियाने को गलियारों में
राह तकता घर का वो आधा सुलगा चूल्हा
बच्चो के इंतज़ार में शहर से लौटने को
जहाँ बैठकर बाबा संग खाते थे 
खाना एक थाली में बच्चे सारे
कहाँ ढूंढे उन कोमल बचपन के 
अनपके से यादों के कुल्हड़ को 
जो इंतज़ार करते होगये हैं
बूढ़े से 
ओर पल पल बाट निहारे
एक बार ही सही ले जाओ गाँव की मिट्टी की सौंधी सुगन्ध सँग तुम्हारे
आजा परदेसी बबुआ एक बारी
गइया पनघट सब बाट निहारे
।। 
भारती प्रवीण...✍🏼💕