......स्त्री हूँ मैं......
दर्पण हूँ इस समाज का ।

फर्क पड़ेगा देखो सब पर
अब मेरी बुलंद आवाज का ।

बेटी, बहन, बीवी ,माँ
सब रिश्ते पलते हैं मुझमें ।

मान हूँ मैं दो परिवारों का
वंश दोनो फलते हैं मुझमें ।

पहरन नए बदलती हूँ
रोज नए रूप में ढलती हूं ।

बेशक पूजन होता है
मंदिरों में मेरा ।

दहलीज के अंदर 
कोई नहीं मेरा ।

झांक कर देखो
सबकुछ दिखता हैं ।

सब भावनाओं का मंदिर
अंदर ही बनता बिगड़ता हैं ।

हाँ स्त्री हूँ मैं......
दर्पण हूँ मैं इस समाज का.......

मुकेश दूहन