बड़े मासूम हैं आंसू, ये कुछ भी न समझते हैं।
अगर गम में बरसते हैं, ख़ुशी में क्यों छलकते हैं?
चुभे लफ़्ज़ों में गिरते हैं, खामोशी पे क्यों बहते हैं?
बड़े मासूम हैं आंसू,ये कुछ भी न समझते हैं।
वो पत्थर है न पिघलेगा, तो कोशिश क्यों ये करते हैं?
अगर नफरत में बहते हैं, मोहब्बत में क्यों रोते हैं?
बड़े मासूम हैं आंसू,ये कुछ भी न समझते हैं।
सिला कुछ भी न निकलेगा,रात दिन आह भरते हैं,
समझ में उनकी पानी हैं, गिला फ़िर क्यों ये करते हैं?
बड़े मासूम हैं आंसू,ये कुछ भी न समझते हैं।
खता करके कभी बहते, कभी करने को बहते हैं,
अगर रुखसत में बहते हैं, मिलन पर क्यों छलकते हैं?
बड़े मासूम हैं आंसू, ये कुछ भी न समझते हैं।
कभी यादों में गिरते हैं, कभी वादों पे बहते हैं,
अगर महफ़िल में बहते हैं, तन्हाई में क्यों रिसते हैं?
बड़े मासूम हैं आंसू,ये कुछ भी न समझते हैं।
मौत से भी बड़ा मंजर , ये थम कर नज़र करते हैं,
ज़रा सी चोट लगने पर , ये खुल कर क्यों बरसते हैं?
बड़े मासूम हैं आंसू, ये कुछ भी न समझते हैं।
ये अश्कों के घने बादल ,भी कुछ नादान लगते हैं,
बड़ी अजीब आदत है, बिना मौसम बरसते हैं।
बड़े मासूम हैं आंसू, ये कुछ भी न समझते हैं।
कभी अपनो को बहते हैं, कभी गैरों को बहते हैं,
यकीं करके अगर रिसते, तोड़ कर क्यों बिखरते हैं?
बड़े मासूम हैं आंसू, ये कुछ भी न समझते हैं।
कभी पाकर छलकते हैं, कभी खोकर बरसते हैं,
ख़ुद ही के कारनामे हैं, मुकद्दर पे क्यों रिसते हैं?
बड़े मासूम हैं आंसू, ये कुछ भी न समझते हैं।
........✍️🌄🙏 ऋतु बाजपेई

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